भ. गी. 4.14
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
अनुवाद
कर्म मुझे बाँधते नहीं हैं क्योंकि मुझमें कर्मफल की इच्छा नहीं है । जो मुझे इस प्रकार जानता है वह कर्मों से बँधता नहीं है ।
कर्म मुझे बाँधते नहीं हैं क्योंकि मुझमें कर्मफल की इच्छा नहीं है । जो मुझे इस प्रकार जानता है वह कर्मों से बँधता नहीं है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता श्वास लेने और हृदय धड़कने का उदाहरण देकर समझाते हैं कि जब तक किसी कार्य में कर्तृत्व-अहंकार नहीं होता, वह केवल सहज 'क्रिया' रहती है जो व्यक्ति को नहीं बांधती। लेकिन जब उसमें 'मैं करने वाला हूँ और इसके फल को भोगूँगा' यह अहंकार आ जाता है, तो वही क्रिया 'कर्म' बनकर चित्त पर आसक्ति का लेप (संस्कार) लगा देती है और व्यक्ति को बंधन में डाल देती है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में श्वास लेने जैसी क्रियाओं को अकर्ता भाव से होने वाली सहज क्रिया बताया गया है जो बंधन नहीं बनाती, और कर्म का बंधन शारीरिक श्रम से नहीं बल्कि मन की फलाशक्ति और अहंकार से होता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार जनक, युधिष्ठिर आदि राजऋषियों ने विशाल वैभव और राज्य संचालन का कर्म करते हुए भी फल-आसक्ति और कर्तृत्व-अभिमान से रहित होकर कर्म किया। 'ज्ञात्वा' (जानकर) का अर्थ है कि जब साधक इस तत्व को सही प्रकार से पहचान लेता है तो उसका अज्ञान दूर होता है, उसकी सोच और भाव बदलते हैं, और वह कर्म करते हुए भी कर्म-बंधन से छूट जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि राजऋषियों ने राज्य या कर्म नहीं छोड़े थे बल्कि कर्मयोग का आचरण किया था; और केवल तोते की तरह श्लोक याद करने से नहीं बल्कि भाव व ज्ञान के आंतरिक रूपांतरण से मुक्ति मिलती है।
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