जिसने कर्म और उसके फलों के प्रति समस्त आसक्ति को त्याग दिया है, जो सदैव सन्तुष्ट रहता है और किसी पर आश्रित नहीं होता – ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से कर्म में प्रवृत्त होकर भी कुछ नहीं करता है ।
भगवद्गीता के श्लोक ४.२० ("त्याक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः...") की व्याख्या के अनुसार, श्रीरामानुजाचार्य जी द्वारा 'नित्यतृप्तः' शब्द का क्या विशेष अर्थ किया गया है, तथा 'निराश्रयः' रहने का वास्तविक दार्शनिक आधार क्या बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि नित्य तत्व केवल आत्मा है, अतः आत्म-साक्षात्कार द्वारा आत्मा में स्थित होना ही वास्तविक 'नित्यतृप्तता' है। इसके साथ ही, सांसारिक वस्तुएँ व अपनी योग्यता का अभिमान अनित्य तथा सीमित हैं जो अंततः दुख ही देते हैं; अतः उनसे अनपेक्षित (निराश्रय) होकर केवल सर्व-समर्थ भगवान का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिए।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार सांसारिक वस्तुओं से कभी नित्य तृप्ति नहीं मिल सकती और न ही निराश्रय का अर्थ बिना भगवद-आश्रय के जंगल में निष्क्रिय बैठना है, बल्कि अनित्य आश्रयों को छोड़कर भगवान की शरण लेना है।
भगवद्गीता के श्लोक ४.२१ ("निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः...") की व्याख्या के अनुसार, आंतरिक और बाह्य त्याग को स्पष्ट करने वाले कौन से दो शब्द आए हैं, तथा 'शारीरं केवलं कर्म' का साधक के जीवन में क्या व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'निराशीः' मन के भीतर की आशा/कामना के त्याग (आंतरिक त्याग) को दर्शाता है और 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' बाहरी वस्तुओं में भोग-बुद्धि के त्याग (बाह्य त्याग) को दर्शाता है। 'शारीरं केवलं कर्म' का अर्थ आलस्य या प्रमाद करना नहीं, बल्कि शरीर-निर्वाह मात्र के लिए आवश्यक कार्य करके अपना अधिकांश समय भगवद्सेवा और साधना में बिताना है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'किल्विषम्' का अर्थ पाप है न कि बाह्य त्याग; और 'शारीरं केवलं कर्म' का उद्देश्य भौतिक धन कमाने में लीन रहना नहीं बल्कि आवश्यकताओं को संयमित कर आध्यात्मिक उन्नति के लिए समय निकालना है।