भ. गी. 4.20

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥

अनुवाद

जिसने कर्म और उसके फलों के प्रति समस्त आसक्ति को त्याग दिया है, जो सदैव सन्तुष्ट रहता है और किसी पर आश्रित नहीं होता – ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से कर्म में प्रवृत्त होकर भी कुछ नहीं करता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.२० ("त्याक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः...") की व्याख्या के अनुसार, श्रीरामानुजाचार्य जी द्वारा 'नित्यतृप्तः' शब्द का क्या विशेष अर्थ किया गया है, तथा 'निराश्रयः' रहने का वास्तविक दार्शनिक आधार क्या बतलाया गया है?

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