भ. गी. 4.19

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥

अनुवाद

जो प्रत्येक कार्य को भोग की इच्छा से रहित होकर करता है और जिसके कर्म ज्ञानाग्नि द्वारा भस्म हो चुके हैं उसे विवेकीजन पण्डित कहते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.१८ ("कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः...") की व्याख्या के अनुसार, 'कर्म में अकर्म' और 'अकर्म में कर्म' देखने का क्या वास्तविक दार्शनिक अर्थ बतलाया गया है?

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