यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
अनुवाद
ईश्वर की इच्छा से जो कुछ भी प्राप्त होता है उसी में सन्तुष्ट रहते हुए जिसने सभी द्वन्द्वों को पार कर लिया है, जो ईर्ष्या से मुक्त है और सफलता तथा असफलता में समचित्त रहता है – वह कर्म करते हुए भी बँधता नहीं है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ४.२०-२१ की तुलना में श्लोक ४.२२-२३ में वर्णित साधक की स्थिति में क्या मुख्य तात्विक अंतर समझाया गया है, तथा 'यदृच्छा' शब्द का क्या वास्तविक अर्थ बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि श्लोक २० और २१ में साधक के द्वारा परिग्रह छोड़ने और चित्त को वश में करने के प्रयत्न (साधनावस्था) की बात थी, जबकि श्लोक २२ में वह स्थिति बताई गई है जो साधना के परिपाक से योगी का सहज स्वभाव बन जाती है। इसके साथ ही, 'यदृच्छा' का अर्थ भगवद्-इच्छा से बिना किसी पूर्व योजना के प्राप्त होने वाली स्थिति है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक केवल संन्यासियों या राजाओं तक सीमित नहीं हैं, और 'यदृच्छा' का अर्थ अपनी इच्छा से धन अर्जित करना नहीं बल्कि प्रभु की इच्छा से प्राप्त फल में संतुष्ट रहना है।
व्याख्यान में दिए गए 'मकान में आग लगने' के दृष्टांत के माध्यम से सांसारिक संबंधों व आसक्ति की क्या वास्तविक प्रकृति समझाई गई है, तथा श्लोक ४.२३ के अनुसार 'समग्रं प्रविलीयते' का क्या शास्त्रीय कारण बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मकान जलने का दुख केवल तब तक था जब तक मन में 'यह मेरा है' की धारणा थी; जैसे ही धारणा बदली कि मकान बिक गया, दुख समाप्त हो गया, जो सिद्ध करता है कि आसक्ति केवल मन की कल्पना है। इसके अलावा, कर्म के लिए कर्ता, कर्म और करण आवश्यक हैं; जब ज्ञानी पुरुष का 'कर्तृत्व-भाव' समाप्त हो जाता है तो कर्म को ठहरने का आधार नहीं मिलता और उसके सारे कर्म पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आसक्ति को वास्तविक नहीं बल्कि मानसिक/कल्पित बतलाया गया है, और 'समग्रं प्रविलीयते' का अर्थ कर्मों का आंशिक विनाश नहीं बल्कि पूरा (१००%) विलीन होना है।