भ. गी. 4.23
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥
अनुवाद
जो आसक्ति एवं देहात्म भाव से मुक्त है, जिसका मन आत्मज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ (अर्थात् अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना) के लिए कार्य करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं ।
जो आसक्ति एवं देहात्म भाव से मुक्त है, जिसका मन आत्मज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ (अर्थात् अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना) के लिए कार्य करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि श्लोक २० और २१ में साधक के द्वारा परिग्रह छोड़ने और चित्त को वश में करने के प्रयत्न (साधनावस्था) की बात थी, जबकि श्लोक २२ में वह स्थिति बताई गई है जो साधना के परिपाक से योगी का सहज स्वभाव बन जाती है। इसके साथ ही, 'यदृच्छा' का अर्थ भगवद्-इच्छा से बिना किसी पूर्व योजना के प्राप्त होने वाली स्थिति है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक केवल संन्यासियों या राजाओं तक सीमित नहीं हैं, और 'यदृच्छा' का अर्थ अपनी इच्छा से धन अर्जित करना नहीं बल्कि प्रभु की इच्छा से प्राप्त फल में संतुष्ट रहना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मकान जलने का दुख केवल तब तक था जब तक मन में 'यह मेरा है' की धारणा थी; जैसे ही धारणा बदली कि मकान बिक गया, दुख समाप्त हो गया, जो सिद्ध करता है कि आसक्ति केवल मन की कल्पना है। इसके अलावा, कर्म के लिए कर्ता, कर्म और करण आवश्यक हैं; जब ज्ञानी पुरुष का 'कर्तृत्व-भाव' समाप्त हो जाता है तो कर्म को ठहरने का आधार नहीं मिलता और उसके सारे कर्म पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आसक्ति को वास्तविक नहीं बल्कि मानसिक/कल्पित बतलाया गया है, और 'समग्रं प्रविलीयते' का अर्थ कर्मों का आंशिक विनाश नहीं बल्कि पूरा (१००%) विलीन होना है।
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