भ. गी. 4.23

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥

अनुवाद

जो आसक्ति एवं देहात्म भाव से मुक्त है, जिसका मन आत्मज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ (अर्थात् अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना) के लिए कार्य करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ४.२०-२१ की तुलना में श्लोक ४.२२-२३ में वर्णित साधक की स्थिति में क्या मुख्य तात्विक अंतर समझाया गया है, तथा 'यदृच्छा' शब्द का क्या वास्तविक अर्थ बतलाया गया है?

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