जिनसे अर्पण किया जाये वे स्रुक् स्रुवा आदि पात्र ब्रह्म हैं, हव्य पदार्थ ब्रह्म है, यज्ञ की जिस अग्नि में आहुति दी जाती है वह ब्रह्म है, जिस पुरोहित द्वारा आहुति दी जाती है वह ब्रह्म है, तथा आहुति देने की क्रिया भी ब्रह्म है । जिसका चित्त ब्रह्मस्वरूप यज्ञ कर्म में तल्लीन है उसका गन्तव्य केवल ब्रह्म ही है ।
भगवद्गीता के श्लोक ४.२४ ("ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को इस जगत् का 'अभिन्न-निमित्त-उपादान कारण' क्यों कहा गया है, तथा 'ब्रह्म-कर्म-समाधि' की स्थिति प्राप्त करने में 'अहंकार' को सबसे बड़ी बाधा क्यों माना गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार सुनार की तरह बाहरी सोने से आभूषण बनाने के विपरीत, भगवान स्वयं इस जगत् के रचयिता (निमित्त) भी हैं और अपनी शक्ति से जगत् रूप में प्रकट (उपादान) भी वही हैं, इसलिए उन्हें अभिन्न-निमित्त-उपादान कारण कहा गया है। इसके अतिरिक्त, अहंकार का कार्य ही 'मेरी पृथक सत्ता है' का भाव दृढ करना है। जब तक यह 'मैं-पना' रहता है, तब तक सर्वत्र ब्रह्म की स्वाभाविक अनुभूति (अद्वैत) संभव नहीं होती और द्वैत बना रहता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान केवल निमित्त कारण नहीं बल्कि उपादान कारण भी स्वयं ही हैं; और अहंकार सबमें ब्रह्म देखने में सहायक नहीं बल्कि पृथकता (द्वैत) पैदा करने वाली सबसे बड़ी बाधा है।
व्याख्यान के अनुसार, चित्त की पाँच अवस्थाओं (क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध) में से आध्यात्मिक साधना का प्रारंभ किस अवस्था से संभव बतलाया गया है, तथा श्लोक ४.२६ के संदर्भ में 'संयम' और 'दमन' में क्या मूलभूत अंतर समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि क्षिप्त (अति चंचल/ADHD) और मूढ़ (निद्रा/अवसाद) अवस्थाओं में साधना असंभव है; केवल 'विक्षिप्त' अवस्था से ही जहाँ रजस-तमस के बीच मन को थोड़ी देर के लिए एकाग्र किया जा सके, साधना शुरू होती है (जिसके लिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिनाम-संकीर्तन का साधन दिया)। इसके अलावा, संयम का अर्थ भोग न करके केवल जीवन-निर्वाह के लिए वस्तुओं का संतुलित उपयोग करना है, जबकि दमन में केवल बाह्य रोक होती है और अंदर भोग की तीव्र तृष्णा बनी रहती है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि क्षिप्त अवस्था में मन का टिकना और साधना संभव नहीं है; और संयम का अर्थ इच्छाओं को दबाना नहीं बल्कि संतुलित उपयोग है, तथा दमन का अर्थ इंद्रियों को स्वतंत्रता देना नहीं बल्कि बलपूर्वक रोकना (मिथ्याचार) है।