भ. गी. 4.26

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥

अनुवाद

कुछ अन्य साधक आत्मसंयम की अग्नि में श्रवणेन्द्रिय आदि इन्द्रियों की आहुति देते हैं जबकि कुछ अन्य साधक इन्द्रियों की अग्नि में शब्द आदि विषयों की आहुति देते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.२४ ("ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को इस जगत् का 'अभिन्न-निमित्त-उपादान कारण' क्यों कहा गया है, तथा 'ब्रह्म-कर्म-समाधि' की स्थिति प्राप्त करने में 'अहंकार' को सबसे बड़ी बाधा क्यों माना गया है?

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