भ. गी. 4.27

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥

अनुवाद

कुछ अन्य साधक इन्द्रियों की एवं प्राणवायुओं की समस्त क्रियाओं को ज्ञान द्वारा प्रज्वलित आत्मसंयम रूपी योग की अग्नि में अर्पित करते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.२४ ("ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को इस जगत् का 'अभिन्न-निमित्त-उपादान कारण' क्यों कहा गया है, तथा 'ब्रह्म-कर्म-समाधि' की स्थिति प्राप्त करने में 'अहंकार' को सबसे बड़ी बाधा क्यों माना गया है?

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