जो अन्य साधक प्राणायाम* में रत हैं, वे उर्ध्वगामी और अधोगामी प्राणवायुओं की गति को नियन्त्रित करते हुए उर्ध्वगामी वायु को अधोगामी में तथा अधोगामी वायु को उर्ध्वगामी में अर्पित करते हैं ।
टिप्पणियाँ
* प्राणायाम का अर्थ शरीर में स्थित जीवन-शक्ति (प्राण) का नियमन अथवा विस्तार है। यह श्वास के नियमन द्वारा किया जाता है, क्योंकि श्वास जीवन-शक्ति का प्रमुख वाहक है। एक अविभाज्य प्राण शरीर में पाँच प्रकार से कार्य करता है; इसलिए उसे प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान—इन पाँच रूपों में समझा जाता है।
व्याख्यान के अनुसार, कार (गाड़ी) और मानव शरीर के बीच आहार (ईंधन) की तुलना में क्या मौलिक तात्विक अंतर बतलाया गया है, तथा श्वास की गति और मन की भावनाओं के बीच का व्यावहारिक संबंध क्या समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि कार पेट्रोल से बनी नहीं होती और न ही क्रोध के समय श्वास स्वाभाविक रूप से गहरी चलती है, बल्कि वह उथली और तेज चलती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि कार पेट्रोल या डीजल से केवल चलती है, उससे बनी नहीं होती; परंतु हमारा शरीर भोजन से चलता भी है और भोजन से ही बना है, इसीलिए इसे अन्नमय शरीर कहते हैं। इसके अलावा, भावनाओं का श्वास से सीधा संबंध है—क्रोध या अशांति में श्वास तेज व उथली चलती है, जबकि गहरी श्वास लेने से मन के विकार और काम-वासना शांत होती है।
व्याख्यान के अनुसार, 'इंद्रिय-आहार' (आँख और कान द्वारा ग्रहण किए गए कुदृश्यों व कुशब्दों) के दूषित होने की तुलना शरीर में उत्पन्न होने वाले किस विकार से की गई है, तथा श्लोक ४.३१ के अनुसार यज्ञ-रहित जीवन जीने वाले व्यक्ति का क्या परिणाम बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि देखे गए दृश्यों के संस्कारों की उल्टी करके उन्हें तुरंत बाहर नहीं निकाला जा सकता और न ही यज्ञ-हीन व्यक्ति इस लोक में वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि गलत भोजन को शरीर उल्टी या दस्त द्वारा बाहर फेंक सकता है, परंतु आँख और कान से ग्रहण किए गए दूषित आहार की उल्टी संभव नहीं है; वे 'आम' (अधपके भोजन के विष) की तरह भीतर बैठकर मन को रोगी बना देते हैं। श्लोक ४.३१ के अनुसार यज्ञ-हीन व्यक्ति न इस लोक में सुखी रहता है और न ही परलोक में।