भ. गी. 4.28

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥

अनुवाद

कुछ लोग द्रव्य दान देकर यज्ञ करते हैं, कुछ तपस्या द्वारा यज्ञ करते हैं, कुछ योग साधना के अनुशासन से यज्ञ करते हैं, और कुछ वेदों के स्वाध्याय द्वारा ज्ञान की साधना करते हुए यज्ञ करते हैं । अपनी-अपनी साधना में दृढ़ रहते हुए ये सभी साधक कठोर व्रतों का पालन करते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.२४ ("ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को इस जगत् का 'अभिन्न-निमित्त-उपादान कारण' क्यों कहा गया है, तथा 'ब्रह्म-कर्म-समाधि' की स्थिति प्राप्त करने में 'अहंकार' को सबसे बड़ी बाधा क्यों माना गया है?

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