भ. गी. 4.3

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥

अनुवाद

आज मैंने वही अति प्राचीन योग तुमसे कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त एवं मित्र हो । निःसंदेह यह परम रहस्य है।

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अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के चौथे अध्याय के प्रथम श्लोक में जिस योग को 'अव्यय' (विनाशरहित) कहा गया था, उसी को दूसरे श्लोक में 'नष्ट' (कालेनेह महता योगो नष्टः) कहने में क्या विरोधाभास और उसका क्या वास्तविक शास्त्रीय अर्थ समझाया गया है?

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