व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के चौथे अध्याय के प्रथम श्लोक में जिस योग को 'अव्यय' (विनाशरहित) कहा गया था, उसी को दूसरे श्लोक में 'नष्ट' (कालेनेह महता योगो नष्टः) कहने में क्या विरोधाभास और उसका क्या वास्तविक शास्त्रीय अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि सत्य कभी नया या पुराना नहीं होता और न ही नष्ट होता है; भगवान वही अनादि व पुरातन योग पुनः प्रकट करते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि पिछले श्लोक में जिसे 'अव्यय' कहा गया, उसका विनाश संभव नहीं है। यहाँ 'नष्ट' धातु अदर्शन अर्थ में आई है, जिसका तात्पर्य वस्तु का नष्ट होना नहीं बल्कि अज्ञान व भोग-आसक्ति के कारण हमारी दृष्टि से ओझल या लुप्त (छुपा हुआ) हो जाना है।
व्याख्यान के अनुसार, श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इस प्राचीन योग को 'रहस्यम् उत्तमम्' (परम रहस्य) कहने और अर्जुन को 'भक्तोऽसि मे सखा चेति' (तुम मेरे भक्त और मित्र हो) स्मरण कराने का क्या सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक उद्देश्य दर्शाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि आध्यात्मिक विद्या केवल भौतिक शब्दावली या पठन से प्राप्त नहीं होती। इसके लिए शिष्य को गुरु या भगवान के साथ श्रद्धा व प्रीति द्वारा 'हृदय का एकत्व' स्थापित करना पड़ता है। 'भक्तोऽसि मे सखा च' कहकर भगवान अर्जुन के पात्र को तैयार करते हैं और उनके हृदय को खोलते हैं ताकि दिव्य ज्ञान सीधा प्रकाशित हो सके।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में इस विचार का खंडन किया गया है; ज्ञान को रहस्य रखने का उद्देश्य स्वार्थ नहीं बल्कि अनधिकारी द्वारा उसका दुरुपयोग रोकना और पात्र की योग्यता निर्मित करना है।