भ. गी. 4.33

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

अनुवाद

हे शत्रुओं को दग्ध करने वाले, बाह्य पदार्थों से सम्बन्धित यज्ञ की अपेक्षा जागरुकता द्वारा किया गया यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि हे पार्थ, सभी कर्म अन्ततः जागरुकता में ही समाप्त होते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ४.३३ में 'द्रव्यमय यज्ञ' की तुलना में 'ज्ञान यज्ञ' को श्रेष्ठ क्यों बतलाया गया है, तथा श्लोक में 'सर्वम्' और 'अखिलम्' दोनों शब्दों के एक साथ प्रयोग का क्या शास्त्रीय अभिप्राय समझाया गया है?

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