भ. गी. 4.34

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

अनुवाद

तुम्हें आत्मसमर्पण, गहन प्रश्न और निःस्वार्थ सेवा के द्वारा इस ज्ञान को आत्मसात करना है । प्रबुद्ध जागरुकता में स्थित तत्त्वदर्शी तुम्हें इस ज्ञान में निर्देश देंगे ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ४.३३ में 'द्रव्यमय यज्ञ' की तुलना में 'ज्ञान यज्ञ' को श्रेष्ठ क्यों बतलाया गया है, तथा श्लोक में 'सर्वम्' और 'अखिलम्' दोनों शब्दों के एक साथ प्रयोग का क्या शास्त्रीय अभिप्राय समझाया गया है?

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