भ. गी. 4.34
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
अनुवाद
तुम्हें आत्मसमर्पण, गहन प्रश्न और निःस्वार्थ सेवा के द्वारा इस ज्ञान को आत्मसात करना है । प्रबुद्ध जागरुकता में स्थित तत्त्वदर्शी तुम्हें इस ज्ञान में निर्देश देंगे ।
तुम्हें आत्मसमर्पण, गहन प्रश्न और निःस्वार्थ सेवा के द्वारा इस ज्ञान को आत्मसात करना है । प्रबुद्ध जागरुकता में स्थित तत्त्वदर्शी तुम्हें इस ज्ञान में निर्देश देंगे ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि कर्म के पीछे का 'भाव' (निष्काम/सेवा भाव) ही उसका अंतिम फल तय करता है। जब कर्म निष्काम जागरूकता (ज्ञान यज्ञ) से किया जाता है तो वह अकर्म बन जाता है, जबकि केवल बाह्य द्रव्यमय यज्ञ सकाम भाव से होने पर भौतिक फल देकर जीव को बांधता है। श्लोक में 'सर्वम्' और 'अखिलम्' दो शब्दों का प्रयोग यह स्पष्ट करने के लिए है कि सारे कर्म पूर्ण रूप से ज्ञान में परिसमाप्त होते हैं और संस्कारों का पूर्ण विनाश हो जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में कर्म त्यागने को ज्ञान यज्ञ नहीं कहा गया है (भगवान अध्याय के अंत में भी अर्जुन को युद्ध करने का ही उपदेश देते हैं), और न ही 'सर्वम् अखिलम्' का अर्थ आंशिक कर्मों का समाप्त होना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'प्रणिपात' शरीर, वाणी और बुद्धि द्वारा अहंकार-रहित वास्तविक समर्पण है। 'परिप्रश्न' का अर्थ अपनी आध्यात्मिक शंकाओं को चारों तरफ से समझकर निष्पक्ष व नम्रता से पूछना है। इसके साथ ही, योग्य गुरु वही है जो 'ज्ञानी' (शास्त्रज्ञ) भी हो ताकि शंकाओं का समाधान कर सके और 'तत्वदर्शी' (अनुभवी) भी हो ताकि साधक को साधना काल में सही दिशा-निर्देश दे सके।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि केवल दिखावे का प्रणाम प्रणिपात नहीं है, परिप्रश्न में सांसारिक समस्याओं के बजाय आध्यात्मिक प्रश्न पूछे जाते हैं, और गुरु के लिए चमत्कार नहीं बल्कि शास्त्र-ज्ञान व स्व-अनुभव अनिवार्य बताए गए हैं।
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