भ. गी. 4.38
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
अनुवाद
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली अन्य कोई वस्तु नहीं है । जिसने निष्काम कर्मयोग से पूर्ण सिद्धि प्राप्त की है उसे समय आने पर स्वतः ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है ।
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली अन्य कोई वस्तु नहीं है । जिसने निष्काम कर्मयोग से पूर्ण सिद्धि प्राप्त की है उसे समय आने पर स्वतः ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि व्रत और दान पाप के मूल (अज्ञान) को नष्ट नहीं करते; और 'पवित्र' का अर्थ शरीर को जलाना नहीं बल्कि अंतःकरण की शुद्धि व पाप से रक्षा होना है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जल, स्नान, व्रत और दान पापों को तो काटते हैं, किंतु अज्ञान रूपी मूल कारण को नष्ट नहीं करते, जिससे मनुष्य के पुनः अपवित्र होने की संभावना बनी रहती है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान (परा विद्या) ही अज्ञान पर कुठाराघात करता है। 'पवित्र' शब्द 'पवि' (वज्र/पाप) से रक्षा करने के अर्थ में है तथा 'सदृश्य' का तात्पर्य ज्ञान द्वारा मिलने वाली अलौकिक दृष्टि से है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'श्रद्धा' ('श्रत' अर्थात् सत्य को धारण करना) से साधक में साधना के प्रति तत्परता और स्वाभाविक इंद्रिय-संयम आता है। इसके अतिरिक्त, द्रोणाचार्य और एकलव्य का प्रसंग यह सिद्ध करने के लिए है कि वास्तविक श्रद्धा क्या होती है—एकलव्य ने सहर्ष गुरु की इच्छा पूर्ण कर उन्हें प्रसन्न किया, जो भौतिक अंगूठे के नुकसान से कहीं बढ़कर उसे अलौकिक आध्यात्मिक सिद्धि और अमर ख्याति दे गया।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में श्रद्धा को अंधविश्वास नहीं बल्कि सत्य में स्थिति और तत्परता का कारण बतलाया गया है; तथा एकलव्य के प्रसंग को अत्याचार नहीं बल्कि निष्काम गुरु-भक्ति व श्रद्धा की पराकाष्ठा का आदर्श उदाहरण सिद्ध किया गया है।
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