जो श्रद्धालु* है, जो इस निष्काम कर्मयोग की साधना में एकनिष्ठ है, और जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया संयमित हैं – वह ज्ञान प्राप्त करता है और इस ज्ञान के साक्षात्कार होने पर वह तत्काल परम शान्ति प्राप्त करता है ।
टिप्पणियाँ
* जब श्रद्धावान् जैसे “न्” पर समाप्त होने वाले शब्द के बाद “ल्” से आरंभ होने वाला शब्द आता है, तब अंतिम “न्” के स्थान पर अनुनासिक “ल्” हो जाता है। लुप्तप्राय इस अनुनासिक रूप को लिप्यंतरण में “ṁl” (अनुस्वार + “l”) के रूप में दर्शाया गया है। 18.17 और 18.71 भी देखें।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ४.३८ में 'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' कहते हुए ज्ञान को जल, यज्ञ, व्रत आदि अन्य पवित्र करने वाले उपायों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ क्यों माना गया है, तथा 'पवित्र' एवं 'सदृश्य' शब्दों का क्या गहरा अर्थ और प्रक्रिया समझाई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि व्रत और दान पाप के मूल (अज्ञान) को नष्ट नहीं करते; और 'पवित्र' का अर्थ शरीर को जलाना नहीं बल्कि अंतःकरण की शुद्धि व पाप से रक्षा होना है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जल, स्नान, व्रत और दान पापों को तो काटते हैं, किंतु अज्ञान रूपी मूल कारण को नष्ट नहीं करते, जिससे मनुष्य के पुनः अपवित्र होने की संभावना बनी रहती है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान (परा विद्या) ही अज्ञान पर कुठाराघात करता है। 'पवित्र' शब्द 'पवि' (वज्र/पाप) से रक्षा करने के अर्थ में है तथा 'सदृश्य' का तात्पर्य ज्ञान द्वारा मिलने वाली अलौकिक दृष्टि से है।
व्याख्यान के अनुसार, श्लोक ४.३९ ("श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्...") में ज्ञान प्राप्त करने हेतु 'श्रद्धा' का क्या वास्तविक स्वरूप और प्रभाव बतलाया गया है, तथा द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य से गुरु-दक्षिणा में अंगूठा माँगने के प्रसंग से श्रद्धा का क्या सर्वोच्च आध्यात्मिक रहस्य प्रकट किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'श्रद्धा' ('श्रत' अर्थात् सत्य को धारण करना) से साधक में साधना के प्रति तत्परता और स्वाभाविक इंद्रिय-संयम आता है। इसके अतिरिक्त, द्रोणाचार्य और एकलव्य का प्रसंग यह सिद्ध करने के लिए है कि वास्तविक श्रद्धा क्या होती है—एकलव्य ने सहर्ष गुरु की इच्छा पूर्ण कर उन्हें प्रसन्न किया, जो भौतिक अंगूठे के नुकसान से कहीं बढ़कर उसे अलौकिक आध्यात्मिक सिद्धि और अमर ख्याति दे गया।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में श्रद्धा को अंधविश्वास नहीं बल्कि सत्य में स्थिति और तत्परता का कारण बतलाया गया है; तथा एकलव्य के प्रसंग को अत्याचार नहीं बल्कि निष्काम गुरु-भक्ति व श्रद्धा की पराकाष्ठा का आदर्श उदाहरण सिद्ध किया गया है।