भ. गी. 4.40
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
अनुवाद
जो अज्ञानी है, श्रद्धाहीन है, और जिसका हृदय सन्देह से जकड़ा हुआ है वह नष्ट हो जाता है । सन्देहग्रस्त व्यक्ति के लिए न तो यह लोक है, न इसके परे स्वर्गलोक है और न ही सुख है ।
जो अज्ञानी है, श्रद्धाहीन है, और जिसका हृदय सन्देह से जकड़ा हुआ है वह नष्ट हो जाता है । सन्देहग्रस्त व्यक्ति के लिए न तो यह लोक है, न इसके परे स्वर्गलोक है और न ही सुख है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि संशय (संदेह व अनिर्णय) के रहते मनुष्य भौतिक जगत् में भी सफल नहीं हो सकता, क्योंकि किसी भी कार्य में सफलता के लिए निश्चय, उत्साह और धैर्य अनिवार्य हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि भौतिक संसार में कई ऐसे लोग हैं जो अज्ञानी या आध्यात्मिक श्रद्धा से रहित होकर भी अपने व्यावहारिक कार्यों में सफल हो जाते हैं। किंतु संशयात्मा व्यक्ति संशय (अनिर्णय) के कारण कोई दृढ़ संकल्प या क्रिया नहीं कर पाता, इसलिए वह न इस लोक में सुख व सफलता प्राप्त करता है और न ही परलोक में; वह दोनों स्थानों से वंचित रह जाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता श्रीजीव गोस्वामी जी के श्लोक ('यावत् पापस्तु मलिनम् हृदयम्...') का उद्धरण देकर बतलाते हैं कि जब तक हृदय पापों से मलिन रहता है, तब तक शास्त्रों व सत-शास्त्र में सत्य-बुद्धि नहीं होती और संशय बना रहता है। इस अज्ञानजन्य संशय को दूर करने के लिए साधु-संग, शास्त्र-अध्ययन तथा तत्वदर्शी गुरु के पास जाकर ज्ञान रूपी तलवार से संशय का पूर्ण विनाश करना आवश्यक है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि संशय का मूल कारण बाहरी परिस्थिति नहीं बल्कि आंतरिक अज्ञान व पाप-संस्कार हैं, और केवल अपने अहंकारपूर्ण शुष्क तर्क से संशय दूर नहीं होता बल्कि साधु-संग व गुरु-शास्त्र के ज्ञान से दूर होता है।
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