अर्जुन उवाच सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥
अनुवाद
अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण, मुझे कर्म-संन्यास का उपदेश देने के पश्चात् आप पुनः निष्काम कर्मयोग का भी उपदेश दे रहे हैं । कृपया मुझे निश्चयपूर्वक बताएँ कि इन दोनों में से कौन सा सबसे अधिक कल्याणकारी है ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्याय को सुनने के बाद भी पांचवें अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन पुनः 'कर्म संन्यास' और 'कर्मयोग' में से एक निश्चित श्रेयस्कर मार्ग चुनने का प्रश्न क्यों पूछते हैं, तथा एक उत्तम आचार्य (शिक्षक) द्वारा तुरंत सीधा उत्तर न देकर इस प्रकार उपदेश देने का क्या मुख्य उद्देश्य बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अर्जुन का स्वभाव और तात्कालिक आसक्ति उन्हें युद्ध से पीछे खींच रही थी, इसलिए वे बार-बार श्रीकृष्ण से अपने मनोनुकूल समर्थन की उम्मीद में प्रश्न पूछते हैं। इसके अलावा, एक कुशल गुरु/अध्यापक शिष्य को तैयार पकाया ज्ञान देने की बजाय उसे स्वयं विचार करने और ज्ञान पचाने की प्रेरणा देता है ताकि वह जीवन की किसी भी परिस्थिति में स्वयं सही निर्णय लेने में समर्थ हो सके।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्रीकृष्ण ने युद्ध को कभी पाप नहीं कहा बल्कि क्षत्रिय का स्वधर्म व श्रेयस्कर मार्ग बतलाया था; और केवल रट लेने या उल्टी कर देने से शिष्य का आध्यात्मिक पोषण नहीं होता।
व्याख्यान के अनुसार, श्लोक ५.२ में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा 'कर्म संन्यास' (सांख्य/ज्ञानयोग) की तुलना में 'निष्काम कर्मयोग' को श्रेष्ठ बताने का क्या दार्शनिक व व्यावहारिक कारण समझाया गया है, तथा यहाँ 'कर्म संन्यास' शब्द का क्या तात्पर्य है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि कर्म संन्यास का तात्पर्य सांख्य/ज्ञानयोग से है जिसके लिए तीव्र वैराग्य (निर्वेद) अनिवार्य है। कर्मयोग इसलिए श्रेष्ठ बतलाया गया है क्योंकि मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया-शक्ति को बलपूर्वक दबाना विकार पैदा करता है; निष्काम भाव से ईश्वर-अर्पण बुद्धि से कर्म करने पर अंतःकरण शुद्ध होता है और जीव स्वाभाविक रूप से ज्ञान के स्तर तक पहुँच जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि ज्ञानयोग आलस्य नहीं बल्कि विवेक पर आधारित कठिन साधना है; और निष्काम कर्मयोग में फल के भोग की इच्छा का त्याग किया जाता है, न कि भौतिक सुखों का संग्रह।