भ. गी. 5.2
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
अनुवाद
श्रीभगवान् ने कहा - कर्म-सन्न्यास एवं निष्काम कर्मयोग दोनों ही परम कल्याणकारी हैं परन्तु कर्म-सन्न्यास की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है ।
श्रीभगवान् ने कहा - कर्म-सन्न्यास एवं निष्काम कर्मयोग दोनों ही परम कल्याणकारी हैं परन्तु कर्म-सन्न्यास की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अर्जुन का स्वभाव और तात्कालिक आसक्ति उन्हें युद्ध से पीछे खींच रही थी, इसलिए वे बार-बार श्रीकृष्ण से अपने मनोनुकूल समर्थन की उम्मीद में प्रश्न पूछते हैं। इसके अलावा, एक कुशल गुरु/अध्यापक शिष्य को तैयार पकाया ज्ञान देने की बजाय उसे स्वयं विचार करने और ज्ञान पचाने की प्रेरणा देता है ताकि वह जीवन की किसी भी परिस्थिति में स्वयं सही निर्णय लेने में समर्थ हो सके।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्रीकृष्ण ने युद्ध को कभी पाप नहीं कहा बल्कि क्षत्रिय का स्वधर्म व श्रेयस्कर मार्ग बतलाया था; और केवल रट लेने या उल्टी कर देने से शिष्य का आध्यात्मिक पोषण नहीं होता।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि कर्म संन्यास का तात्पर्य सांख्य/ज्ञानयोग से है जिसके लिए तीव्र वैराग्य (निर्वेद) अनिवार्य है। कर्मयोग इसलिए श्रेष्ठ बतलाया गया है क्योंकि मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया-शक्ति को बलपूर्वक दबाना विकार पैदा करता है; निष्काम भाव से ईश्वर-अर्पण बुद्धि से कर्म करने पर अंतःकरण शुद्ध होता है और जीव स्वाभाविक रूप से ज्ञान के स्तर तक पहुँच जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि ज्ञानयोग आलस्य नहीं बल्कि विवेक पर आधारित कठिन साधना है; और निष्काम कर्मयोग में फल के भोग की इच्छा का त्याग किया जाता है, न कि भौतिक सुखों का संग्रह।
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