भ. गी. 5.10

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

अनुवाद

जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी गीला नहीं होता, वैसे ही परमेश्वर को अपने कर्म समर्पित करने वाला तथा कर्म और उसके फल के प्रति समस्त आसक्ति का त्याग करने वाला व्यक्ति, कर्म में भाग लेकर भी पाप में लिप्त नहीं होता।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.८-९ ("नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्...") की व्याख्या के अनुसार, ज्ञानी (तत्त्ववित्) पुरुष द्वारा यह मानने का कि "मैं कुछ भी नहीं करता हूँ" (न किञ्चित् करोमि) क्या तात्विक कारण बतलाया गया है, तथा उसमें वर्णित १३ क्रियाओं के संबंध में कार और उसकी बैटरी के दृष्टांत से क्या सिद्धांत सिद्ध किया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।