ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
अनुवाद
जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी गीला नहीं होता, वैसे ही परमेश्वर को अपने कर्म समर्पित करने वाला तथा कर्म और उसके फल के प्रति समस्त आसक्ति का त्याग करने वाला व्यक्ति, कर्म में भाग लेकर भी पाप में लिप्त नहीं होता।
भगवद्गीता के श्लोक ५.८-९ ("नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्...") की व्याख्या के अनुसार, ज्ञानी (तत्त्ववित्) पुरुष द्वारा यह मानने का कि "मैं कुछ भी नहीं करता हूँ" (न किञ्चित् करोमि) क्या तात्विक कारण बतलाया गया है, तथा उसमें वर्णित १३ क्रियाओं के संबंध में कार और उसकी बैटरी के दृष्टांत से क्या सिद्धांत सिद्ध किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि श्वास लेना या पलकें झपकना जैसी प्राकृतिक क्रियाएँ रुकती नहीं हैं बल्कि स्वतः चलती रहती हैं; तथा कार का दृष्टांत यात्री के स्वयं पैदल चलने का नहीं बल्कि कार चलने को अपनी क्रिया मान लेने के भ्रम को दर्शाने के लिए दिया गया है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, तत्त्ववित् जानता है कि ५ ज्ञानेंद्रियों (देखना, सुनना, स्पर्श, सूंघना, आस्वादन), ५ कर्मेंद्रियों (चलना, बोलना, मलमूत्र त्याग, ग्रहण) तथा प्राण/अंतःकरण की क्रियाओं (सोना, श्वास, पलकें झपकना) सहित १३ क्रियाएँ केवल प्रकृति और इंद्रियों के स्तर पर हो रही हैं। जैसे कार में बैठी सवारी या बैटरी कार की यात्रा को अपनी यात्रा मान लेती है जबकि वास्तव में कार चलती है, उसी प्रकार अज्ञानी शरीर की क्रियाओं को अपना मान लेता है जबकि तत्त्ववित् स्वयं को अकर्ता आत्मा जानता है।
भगवद्गीता के श्लोक ५.१० ("ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः...") की व्याख्या के अनुसार, कर्म करते हुए भी पाप या कर्म-बंधन से अलिप्त रहने के लिए 'कमल के पत्ते' और 'बैंक के क्लर्क' का क्या दृष्टांत बतलाया गया है, तथा 'सूक्ष्म आसक्ति' के संबंध में क्या चेतावनी दी गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार, जिस प्रकार जल में रहते हुए भी कमल का पत्ता निर्लिप्त रहता है और बैंक क्लर्क पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा से पैसों का हिसाब रखते हुए भी उन्हें बैंक का मानकर आसक्ति-रहित रहता है, उसी प्रकार सब कुछ भगवान का समझकर कर्म करने वाला कर्म-बंधन से मुक्त रहता है। इसके साथ ही, वक्ता बताते हैं कि मान, प्रतिष्ठा और प्रशंसा की इच्छा जैसी 'सूक्ष्म आसक्ति' स्थूल विकारों से अधिक घातक है क्योंकि यह साधक को आसानी से दिखती नहीं है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि कमल का पत्ता जल से गीला नहीं होता और क्लर्क पैसों को अपना नहीं बल्कि बैंक का समझता है; तथा सूक्ष्म आसक्ति (मान-प्रशंसा की लालसा) मोक्ष की ओर नहीं ले जाती बल्कि आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा/अनर्थ बनती है।