भ. गी. 5.11
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥
अनुवाद
कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके शरीर, मन, बुद्धि और यहाँ तक कि केवल इन्द्रियों के द्वारा भी अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं ।
कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके शरीर, मन, बुद्धि और यहाँ तक कि केवल इन्द्रियों के द्वारा भी अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार, वास्तविक आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त होती है, इसलिए यहाँ 'आत्म-शुद्धि' का तात्पर्य चित्त-शुद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) से है। श्लोक में आए 'केवलैः' शब्द का अभिप्राय 'ममता-हीन' होना है—अर्थात् यह समझना कि शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ प्रकृति के अंश हैं तथा जीव का उन पर कोई निजी अधिकार या स्वामित्व नहीं है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आत्मा कभी अशुद्ध नहीं होती और न ही यहाँ 'आत्मा' का अर्थ केवल स्थूल शरीर है; तथा 'केवलैः' का अर्थ मन-बुद्धि को छोड़ना नहीं बल्कि ममता और अहंता के त्याग से है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि कर्म करने पर उसका फल तो आता ही है, किंतु 'युक्त' व्यक्ति उस फल की आसक्ति को छोड़ देता है, जिससे वह परम शान्ति (मोक्ष) पाता है। इसके विपरीत, 'अयुक्त' व्यक्ति अपनी कामना से संचालित होकर फल में आसक्त होता है, जो उसकी स्वतंत्रता छीनकर उसे पुनर्जन्म व कर्म-बंधन में फँसा देता है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि कर्मफल त्याग का अर्थ कर्म या फल को जबरन रोकना नहीं बल्कि फल में आसक्ति छोड़ना है; और अनासक्ति ही वास्तविक शान्ति का आधार है।
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