भ. गी. 5.18
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
अनुवाद
जो विवेकी है, वे विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से देखते हैं।
जो विवेकी है, वे विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से देखते हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में चारों पदों का सार आंतरिक भाव बतलाया गया है, न कि केवल शारीरिक तपस्या; और इंद्र का प्रसंग भाव-हीनता को उजागर करता है, न कि अधिकारों के छीने जाने को।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'तद्बुद्धयः' (बुद्धि भगवान में लगाना), 'तदात्मानः' (यहाँ आत्मा = मन, चिंतन भगवान में होना), 'तन्निष्ठाः' (भगवान में स्थिति) और 'तत्परायणाः' (भगवद्-शरणागति) का मुख्य सार आंतरिक भक्ति-भाव है। इसके साथ ही, इंद्र को भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन होने पर भी पारिजात वृक्ष के प्रसंग में वे लड़ने आ गए थे, जो यह दर्शाता है कि केवल बाह्य दर्शन नहीं बल्कि आंतरिक भाव व निष्ठा ही वास्तविक प्राप्ति है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि कुत्ते, गाय और ब्राह्मण को एक जैसा भोजन देना अज्ञानता होगी; और समवर्ती यमराज का नाम है, न कि केवल शास्त्र-पाठ का।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि 'समदृष्टि' आत्मिक स्तर पर होती है, जबकि व्यवहार शरीर के स्तर पर भिन्न-भिन्न होता है (समवर्ती होना यमराज का नाम है जो बिना भेद के दंड/मृत्यु देता है)। जैसे हम अपने शरीर के अलग-अलग अंगों (सिर, पैर, मुख) से अलग-अलग व्यवहार करते हैं किंतु सबके प्रति आरोग्य व सुख की समान दृष्टि रखते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समाज में सर्वत्र समदृष्टि रखते हुए भी प्राणिमात्र के शरीरानुकूल व्यवहार करता है।
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