जो तपस्वीजन काम एवं क्रोध से रहित हैं, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है और जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार कर लिया है, उनके लिए जीवित रहते हुए तथा मृत्यु के पश्चात् भी ब्रह्मनिर्वाण विद्यमान है ।
भगवद्गीता के श्लोक ५.२५ ("लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः...") की व्याख्या के अनुसार, 'ऋषि' व 'छिन्नद्वैधा' का तात्विक अर्थ क्या बतलाया गया है, तथा 'सर्वभूतहिते रताः' के संदर्भ में धर्मराज युधिष्ठिर के स्वर्गरोहण पर्व के किस प्रसंग द्वारा सर्वोच्च परहित-भाव को स्पष्ट किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'ऋषि' वे हैं जिनकी आध्यात्मिक दृष्टि (मंत्र द्रष्टा) है और जो माया से परे तत्व को देखते हैं। 'छिन्नद्वैधा' का अर्थ संशयों का छिन्न होना है, जो हृदय के पाप समाप्त होने पर ही संभव है। इसके साथ ही, महाभारत के स्वर्गरोहण पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर ने नरकवासियों को अपने पुण्य-शरीर की स्पर्श-वायु से सुख मिलता देखकर स्वर्ग जाने से इंकार कर दिया, जो दूसरों के सुख हेतु अपने सुख का त्याग करने वाले 'सर्वभूतहिते रताः' भाव का अनुपम उदाहरण है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'ऋषि' का संबंध केवल जंगल में रहने से नहीं बल्कि ज्ञान-दृष्टि से है, और न ही युधिष्ठिर जी ने स्वर्ग में दुर्योधन को देखकर युद्ध किया था, बल्कि उन्होंने दूसरों के हित के लिए स्वर्ग-सुख का त्याग किया था।
भगवद्गीता के श्लोक ५.२६ ("कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्...") की व्याख्या के अनुसार, श्लोक ५.२३ के 'सोढुम्' (सहन करने) की तुलना में श्लोक ५.२६ के 'विमुक्तानाम्' में क्या तात्विक अंतर है, तथा 'कुएँ व बाल्टी' एवं 'राजा व कारावास' के दृष्टांतों से चित्त के विकारों तथा साधना का क्या मुख्य सिद्धांत सिद्ध किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि श्लोक ५.२३ में काम-क्रोध के वेग का उफान आता है जिसे विवेक से सहन करना पड़ता है, परंतु ५.२६ में आत्मज्ञान के परिपाक से साधक काम-क्रोध से पूर्णतः विमुक्त हो जाता है। 'कुएँ व बाल्टी' का दृष्टांत दर्शाता है कि चित्त में दबे हुए काम-क्रोध अनुकूल परिस्थिति या ट्रिगर (बाल्टी) मिलते ही बाहर छलक आते हैं। तथा राजा और कैदी के दृष्टांत से सिद्ध होता है कि जो साधक अपने भीतर काम-क्रोध का रोग स्वीकार करता है, वही वैद्य (गुरु/ईश्वर) के पास जाकर सुधर सकता है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि ५.२६ में सहन करने की आवश्यकता ही नहीं रहती क्योंकि वेग समाप्त हो जाता है, और राजा वाले दृष्टांत में अपनी गलती मानने वाले को ही मुक्ति के योग्य माना गया है, न कि झूठी सफाई देने वालों को।