स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
अनुवाद
बाह्य इन्द्रिय-विषयों के समस्त विचारों को बाहर निकालकर, नेत्रों की दृष्टि को भौंहों* के मध्य में केन्द्रित करके, तथा नासिका के भीतर और बाहर जाने वाले श्वास को नियन्त्रित करते हुए, जिस ऋषि ने अपने इन्द्रिय, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष प्राप्ति हेतु समर्पित है, और जो इच्छा, भय एवं क्रोध से रहित है, वह वास्तव में सदैव मुक्त है ।
टिप्पणियाँ
* इसका अर्थ है—आँखें आधी बंद रखकर दृष्टि को अपने से थोड़ी दूरी पर केंद्रित करना।
भगवद्गीता के श्लोक ५.२७-२८ ("स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवानन्तरे भ्रुवोः...") की व्याख्या के अनुसार, प्राणायाम द्वारा श्वास और मन की भावनाओं के संबंध को कैसे समझाया गया है, तथा भों के मध्य ध्यान (आज्ञा चक्र) लगाने का क्या वास्तविक वैज्ञानिक व आध्यात्मिक अभिप्राय बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में श्वास और भावों का प्रत्यक्ष संबंध बतलाया गया है, और आँखें पूरी तरह बंद करने से 'लय' (निद्रा/आलस्य) का दोष आ जाता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि मन के भावों से श्वास बदलती है और श्वास को संतुलित (प्राणायाम) करके मन के विकार व क्रोध शांत किए जा सकते हैं। इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित करने से सुषुम्ना नाड़ी चलती है जो समता की स्थिति है। भों के बीच आज्ञा चक्र (कंट्रोल सेंटर) पर ध्यान लगाने का अर्थ दृष्टि को स्थिर करना है ताकि ध्यान के दो मुख्य विघ्न—'लय' (नींद/आलस्य) और 'विक्षेप' (मन का इधर-उधर भागना) शांत हो सकें।
भगवद्गीता के श्लोक ५.२९ ("भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्...") की व्याख्या के अनुसार, इसे 'शांति-मंत्र' (शांति का सूत्र) क्यों कहा गया है, तथा श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के अनुसार यह श्लोक कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग—इन चारों मार्गों को कैसे एक साथ जोड़ता है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बतलाते हैं कि अशांति का मूल कारण अज्ञान और स्वयं को भोक्ता व मालिक मानना है। जब साधक यह स्वीकार कर लेता है कि भगवान ही सब कुछ के स्वामी, नियंता और हमारे परम हितैषी हैं, तो मन तुरंत निष्चिंत और शांत हो जाता है। टीकाकार श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के अनुसार, यज्ञ करने वाले (कर्मयोगी), तपस्या करने वाले (ज्ञानयोगी), परमात्मा का ध्यान करने वाले (राजयोगी) और सुहृद् मानने वाले (भक्त)—सबके परम देव और उपास्य भगवान ही हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि ५.२९ को सर्वसाधारण के लिए सबसे सरल 'शांति का फार्मूला' कहा गया है, और सभी योग मार्गों के लिए भगवान ही परम उपास्य सिद्ध किए गए हैं।