भ. गी. 5.4

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥

अनुवाद

अनुभवहीन व्यक्ति कहते हैं कि कर्म-सन्न्यास (सांख्ययोग) एवं निष्काम कर्मयोग पृथक् मार्ग हैं परन्तु विवेकी जन इस निष्कर्ष का समर्थन नहीं करते क्योंकि जो व्यक्ति दोनों में से किसी एक में भी दृढ़ता से स्थित होता है, उसे दोनों का फल प्राप्त हो जाता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ५.३ में निष्काम कर्मयोगी को 'नित्य संन्यासी' क्यों कहा गया है, तथा श्लोक में 'राग' से पहले 'द्वेष' (ना द्वेष्टि न काङ्क्षति) शब्द रखने का क्या विशेष आध्यात्मिक कारण बतलाया गया है?

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