भ. गी. 5.3

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥

अनुवाद

हे महाबाहो, जो कर्मयोगी न तो कभी किसी से द्वेष करता है और न ही किसी की आकांक्षा रखता है, उसे (कर्म में रत रहते हुए भी) प्रत्येक क्षण सन्न्यासी समझना चाहिए क्योंकि जो द्वन्द्वों से रहित है, वह सहज ही बन्धन से मुक्त हो जाता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ५.३ में निष्काम कर्मयोगी को 'नित्य संन्यासी' क्यों कहा गया है, तथा श्लोक में 'राग' से पहले 'द्वेष' (ना द्वेष्टि न काङ्क्षति) शब्द रखने का क्या विशेष आध्यात्मिक कारण बतलाया गया है?

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