ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
अनुवाद
हे महाबाहो, जो कर्मयोगी न तो कभी किसी से द्वेष करता है और न ही किसी की आकांक्षा रखता है, उसे (कर्म में रत रहते हुए भी) प्रत्येक क्षण सन्न्यासी समझना चाहिए क्योंकि जो द्वन्द्वों से रहित है, वह सहज ही बन्धन से मुक्त हो जाता है ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ५.३ में निष्काम कर्मयोगी को 'नित्य संन्यासी' क्यों कहा गया है, तथा श्लोक में 'राग' से पहले 'द्वेष' (ना द्वेष्टि न काङ्क्षति) शब्द रखने का क्या विशेष आध्यात्मिक कारण बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि कर्मयोग में किसी विशेष विधि से संन्यास धारण नहीं किया जाता और न ही द्वेष से भक्ति की शक्ति मिलती है; द्वेष तो सेवा और भक्ति के पूर्णतः विपरीत है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि बाहरी वेश धारण करना केवल एक चिन्ह (लिंगधारी सन्यास) है, परंतु वास्तविक संन्यास हमारे स्वरूप का लक्षण है जो राग और द्वेष से रहित होना है। राग-द्वेष में द्वेष को पहले इसलिए रखा गया क्योंकि द्वेष सेवा-भाव को पूर्णतः नष्ट कर देता है और दूसरों की हानि पहुँचाकर अत्यधिक हानिकारक होता है, जबकि राग के वशीभूत होकर भी व्यक्ति किसी की सेवा कर सकता है।
व्याख्यान के अनुसार, श्लोक ५.४-५ की व्याख्या में सांख्य (कर्म संन्यास) और कर्मयोग को भिन्न मानने वालों को 'बाल' (अज्ञानी) क्यों कहा गया है, तथा वर्षा/छाते के दृष्टांत द्वारा दोनों के 'एक ही फल' को कैसे स्पष्ट किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अज्ञानी कहने का कारण केवल व्याकरण न जानना नहीं बल्कि फल की एकता को न समझना है, और कर्मयोगी को दोगुना फल नहीं बल्कि दोनों को समान ही फल मिलता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि प्रक्रिया भिन्न होने पर भी दोनों मार्गों का गंतव्य और फल एक ही है, इसलिए इन्हें अलग मानने वाले अज्ञानी (बाल) हैं। वर्षा में जैसे एक व्यक्ति घर में रहकर नहीं भीगता (सांख्य) और दूसरा छाता ओढ़कर बाहर कार्य करते हुए नहीं भीगता (कर्मयोग), वैसे ही दोनों ही कर्म-बंधन से असंपृक्त रहकर एक ही फल (मुक्ति) प्राप्त करते हैं।