भ. गी. 5.6

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥

अनुवाद

हे महाबाहो, निष्काम कर्मयोग के बिना कर्म से सन्न्यास प्राप्त करना कठिन है । परन्तु जो मुनि निष्काम कर्म में रत रहता है, वह शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.६ ("संन्यासस्तु महाबाहो दुखमाप्तुमयोगतः...") की व्याख्या के अनुसार, कर्मयोग के अभ्यास के बिना सीधे संन्यास लेने पर साधक को कष्ट क्यों उठाना पड़ता है, तथा श्लोक में 'मुनि' (मननशील) शब्द का क्या गहरा व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है?

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