योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
अनुवाद
जो निष्काम कर्मयोग का पालन करता है, जिसका चित्त शुद्ध है, जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और जो समस्त जीवों के लिए उनकी आत्मा के समान प्रिय है, वह कर्म करते हुए भी कभी लिप्त नहीं होता ।
भगवद्गीता के श्लोक ५.६ ("संन्यासस्तु महाबाहो दुखमाप्तुमयोगतः...") की व्याख्या के अनुसार, कर्मयोग के अभ्यास के बिना सीधे संन्यास लेने पर साधक को कष्ट क्यों उठाना पड़ता है, तथा श्लोक में 'मुनि' (मननशील) शब्द का क्या गहरा व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि कर्मयोग के बिना संन्यास लेने पर आंतरिक राग-द्वेष नष्ट नहीं होते। जब तक चित्त शुद्ध न हो, बाह्य वेश धारण करने से कोई साधु नहीं बनता और केवल इंद्रिय-दमन करने से मिथ्याचार बढ़ता है। इसके साथ ही, 'मुनि' का तात्पर्य केवल चुप रहना नहीं बल्कि निरंतर यह मनन व जागरूकता रखना है कि मेरे कर्म में कर्तृत्व-अहंकार या स्वार्थ का भाव तो नहीं आ रहा है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि संन्यास का अर्थ दफ़्तर में नौकरी करना नहीं है, और न ही मुनि का अर्थ केवल बाह्य मौन है बल्कि आंतरिक मननशीलता व सजगता है।
भगवद्गीता के श्लोक ५.७ ("योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितत्मा जितेंद्रियः...") की व्याख्या के अनुसार, कर्म करते हुए भी कर्म-बंधन से असंपृक्त रहने का क्या सूत्र बतलाया गया है, तथा इंद्रिय-संयम के संदर्भ में 'रसना-इंद्रिय' (जिह्वा) के नियंत्रण की क्या विशेष महत्ता समझाई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि इंद्रियों को फोड़ना या नष्ट करना समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि कामना मन में बैठी रहती है; तथा जिह्वा-संयम का अर्थ भोजन त्यागना नहीं बल्कि संयमित और आवश्यकतानुसार भगवद्-प्रसाद ग्रहण करना है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बतलाते हैं कि कर्म करते हुए निर्लिप्त रहने का पाँच-स्तरीय सूत्र है: निष्काम भाव (योगयुक्त), शुद्ध अंतःकरण (विशुद्धात्मा), मन-शरीर नियंत्रण (विजितात्मा), इंद्रिय-जय (जितेंद्रिय) और सर्वप्राणियों में आत्म-भाव। इसके अलावा, भागवत के ११वें स्कंध से उद्धरण देकर वक्ता स्पष्ट करते हैं कि जिह्वा (रसना) सबसे प्रबल इंद्रिय है; यदि रसना पर विजय प्राप्त कर ली जाए, तो सभी इंद्रियाँ स्वतः विजित हो जाती हैं।