भ. गी. 5.7

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥

अनुवाद

जो निष्काम कर्मयोग का पालन करता है, जिसका चित्त शुद्ध है, जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और जो समस्त जीवों के लिए उनकी आत्मा के समान प्रिय है, वह कर्म करते हुए भी कभी लिप्त नहीं होता ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.६ ("संन्यासस्तु महाबाहो दुखमाप्तुमयोगतः...") की व्याख्या के अनुसार, कर्मयोग के अभ्यास के बिना सीधे संन्यास लेने पर साधक को कष्ट क्यों उठाना पड़ता है, तथा श्लोक में 'मुनि' (मननशील) शब्द का क्या गहरा व्यावहारिक अर्थ समझाया गया है?

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