भ. गी. 6.19

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

अनुवाद

जिस प्रकार स्पन्दन-रहित वायु के स्थान में रखी हुई दीपक की लौ विचलित नहीं होती है, उसी प्रकार योगी, जिसका मन नियन्त्रित होता है, वह अविचल रूप से आत्मा पर ध्यान में स्थित रहता है। इस विषय में यही उपमा दी गई है।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.१८ ("यदा विनियतं चित्तम्...") की व्याख्या के अनुसार, पतंजलि योगसूत्र के व्यास-भाष्य में वर्णित चित्त की ५ अवस्थाओं में से कौन-सी अवस्थाएँ समाधि/ध्यान हेतु उपयुक्त हैं, तथा श्लोक के किन पदों का संबंध 'अभ्यास' और 'वैराग्य' से बतलाया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।