जब अनुशासित मन केवल आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और मनुष्य सभी प्रकार के इन्द्रिय-भोग की आकांक्षा से मुक्त हो जाता है, तब वह युक्त कहलाता है – अर्थात् वह योग में दृढ़तापूर्वक स्थित होता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.१८ ("यदा विनियतं चित्तम्...") की व्याख्या के अनुसार, पतंजलि योगसूत्र के व्यास-भाष्य में वर्णित चित्त की ५ अवस्थाओं में से कौन-सी अवस्थाएँ समाधि/ध्यान हेतु उपयुक्त हैं, तथा श्लोक के किन पदों का संबंध 'अभ्यास' और 'वैराग्य' से बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार व्यास-भाष्य में चित्त की ५ अवस्थाएँ बतलाई गई हैं—क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। क्षिप्त (चंचल) और मूढ़ (तामस) अवस्थाओं में ध्यान नहीं हो सकता। ध्यान योग हेतु एकाग्र और निरुद्ध अवस्थाएँ आवश्यक हैं। इसके साथ ही पतंजलि के सूत्र (अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः) की तुलना करते हुए बतलाया गया है कि 'विनियतम् चित्तम्' अभ्यास द्वारा मन पर नियंत्रण को दर्शाता है और 'निष्प्रहः सर्वकामेभ्यः' वैराग्य को व्यक्त करता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि क्षिप्त अवस्था में मन अनियंत्रित कार की भाँति भागता है जिससे ध्यान संभव नहीं है, और 'विनियतम्' का अर्थ अभ्यास द्वारा मन को वश में करना है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.१९ ("यथा दीपो निवातस्थो...") की व्याख्या के अनुसार, हवा से रहित (निवात) स्थान में रखी दीपक की अचल लौ का दृष्टांत किस अवस्था को दर्शाने हेतु दिया गया है, तथा मनुष्य द्वारा बिना कोई शारीरिक कार्य किए भी मानसिक थकावट अनुभव करने का क्या मुख्य कारण बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि उपमा का तात्पर्य मानसिक स्थिरता से है, न कि आँधी में दीया जलाने से; और थकावट का कारण व्यर्थ का मानसिक चिंतन बतलाया गया है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.१९ में भगवान 'निवातस्थ दीपक' (हवा से रहित स्थान के दीपक) की उपमा देते हैं, जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार हवा न होने पर लौ सीधी और स्थिर रहती है, उसी प्रकार यतचित्त योगी का मन सांसारिक विषयों या निंदा-प्रशंसा से विचलित नहीं होता। वक्ता समझाते हैं कि कई लोग शारीरिक कार्य न करने पर भी थके रहते हैं क्योंकि उनकी चेतना व्यर्थ के मनोगत चिंतन, दूसरों के दोष देखने और नकारात्मक विचारों में बहकर अपनी मानसिक ऊर्जा का ह्रास करती रहती है।