भ. गी. 6.21

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥

अनुवाद

उस अवस्था में योगी उस शाश्वत सुख का अनुभव करता है जो बाह्य इन्द्रियों की पहुँच से परे है और केवल (आत्मा के स्वरूप से युक्त) बुद्धि के द्वारा ही ग्राह्य है। उस अवस्था में स्थित होकर वह परम सत्य से किञ्चित् भी विचलित नहीं होता है।

टिप्पणियाँ

* श्रीधर स्वामी और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर—दोनों ने बुद्धि शब्द पर टिप्पणी करते हुए इस क्रिया-विशेषणात्मक उपवाक्य का प्रयोग किया है। हमने इसे यहाँ अन्वय में सम्मिलित किया है, क्योंकि यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि किस प्रकार की बुद्धि श्लोक में वर्णित शाश्वत आनंद का अनुभव कर सकती है। वह आनंद दिव्य होने के कारण बुद्धि की सामान्य क्रियाओं से ग्रहण नहीं किया जा सकता; उसका अनुभव केवल उस बुद्धि से होता है “जिस पर आत्मा का स्वरूप अंकित हो।” इस बात की और पुष्टि करते हुए श्रील विश्वनाथ कहते हैं कि ऐसा आनंद विशेष रूप से समाधि की ज्ञानातीत अवस्था में अनुभव किया जा सकता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.२० ("यत्रोपरामते चित्तं निरुद्धं योगसेवया...") की व्याख्या के अनुसार, 'आत्मना आत्मानं पश्यन्' (आत्मा द्वारा आत्मा को देखना) में 'आत्मना' (करण) का वास्तविक तात्विक अर्थ क्या समझाया गया है, तथा सुशुप्ति (गहरी नींद) और योगज 'चित्त-निरोध' में क्या मूलभूत अंतर बतलाया गया है?

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