सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
अनुवाद
उस अवस्था में योगी उस शाश्वत सुख का अनुभव करता है जो बाह्य इन्द्रियों की पहुँच से परे है और केवल (आत्मा के स्वरूप से युक्त) बुद्धि के द्वारा ही ग्राह्य है। उस अवस्था में स्थित होकर वह परम सत्य से किञ्चित् भी विचलित नहीं होता है।
टिप्पणियाँ
* श्रीधर स्वामी और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर—दोनों ने बुद्धि शब्द पर टिप्पणी करते हुए इस क्रिया-विशेषणात्मक उपवाक्य का प्रयोग किया है। हमने इसे यहाँ अन्वय में सम्मिलित किया है, क्योंकि यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि किस प्रकार की बुद्धि श्लोक में वर्णित शाश्वत आनंद का अनुभव कर सकती है। वह आनंद दिव्य होने के कारण बुद्धि की सामान्य क्रियाओं से ग्रहण नहीं किया जा सकता; उसका अनुभव केवल उस बुद्धि से होता है “जिस पर आत्मा का स्वरूप अंकित हो।” इस बात की और पुष्टि करते हुए श्रील विश्वनाथ कहते हैं कि ऐसा आनंद विशेष रूप से समाधि की ज्ञानातीत अवस्था में अनुभव किया जा सकता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.२० ("यत्रोपरामते चित्तं निरुद्धं योगसेवया...") की व्याख्या के अनुसार, 'आत्मना आत्मानं पश्यन्' (आत्मा द्वारा आत्मा को देखना) में 'आत्मना' (करण) का वास्तविक तात्विक अर्थ क्या समझाया गया है, तथा सुशुप्ति (गहरी नींद) और योगज 'चित्त-निरोध' में क्या मूलभूत अंतर बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आत्मा भौतिक आँखों से दृश्य नहीं है, और सुशुप्ति तामसिक अवस्था होने के कारण समाधि या मोक्ष नहीं है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, आत्मा में चर्म-चक्षु या भौतिक इंद्रियाँ नहीं होतीं, अतः श्लोक में 'आत्मना' (करण) का अभिप्राय शुद्ध व एकाग्र मन से है। इसके अलावा, सुशुप्ति अवस्था में भी बाह्य विषय रुक जाते हैं, किंतु वह तमोगुण की अवस्था है जिससे अज्ञान बना रहता है; जबकि योग के अभ्यास (योगसेवया) से सत्वगुण में चित्त का निरोध होता है और शुद्ध मन से आत्मा का साक्षात्कार होता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.२१ ("सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्...") की व्याख्या के अनुसार, आत्मिक सुख को 'अतीन्द्रिय' और 'बुद्धिग्राह्य' क्यों कहा गया है, तथा सुशुप्ति के सुख की तुलना में इस समाधि-सुख की क्या विशेष जागृत स्थिति बतलाई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बतलाते हैं कि इंद्रियों और विषयों के संयोग का सुख सीमित होता है तथा इंद्रियाँ समय के साथ थक जाती हैं, किंतु आत्मिक सुख इंद्रियातीत (अतीन्द्रिय) व अक्षय है। यह सत्वगुणमयी बुद्धि द्वारा जागृत अवस्था में ही अनुभव होता है (बुद्धिग्राह्यम्), जबकि सुशुप्ति में बुद्धि तमस में लीन रहने के कारण उस समय अवेयरनेस नहीं होती।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'अतीन्द्रिय' का अर्थ इंद्रिय-भोगों से परे होना है, और 'बुद्धिग्राह्यम्' का अर्थ बुद्धि की जागृत चेतना से अनुभव होना है, न कि सुशुप्ति या मूर्छा से।