भ. गी. 6.22

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥

अनुवाद

उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर मनुष्य किसी भी अन्य लाभ को उससे अधिक नहीं मानता है और उसमें स्थित होकर वह भीषण दुःख में भी विचलित नहीं होता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.२२ ("यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः...") की व्याख्या के अनुसार, परमात्मा से प्राप्त अतीन्द्रिय सुख की तुलना में अन्य सुखों की स्थिति तथा राजस्थान की भक्त करमती बाई के प्रसंग द्वारा क्या मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा समझाई गई है?

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