भ. गी. 6.25
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥
अनुवाद
धारणा द्वारा दृढ़ की गई बुद्धि के माध्यम से मन को आत्मा में स्थिर करके अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करते हुए मन को धीरे-धीरे शान्त करना चाहिए।
धारणा द्वारा दृढ़ की गई बुद्धि के माध्यम से मन को आत्मा में स्थिर करके अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करते हुए मन को धीरे-धीरे शान्त करना चाहिए।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि पहले मन में विषय की स्फूर्ति/विचार आता है, जिससे संकल्प (यह अच्छा/अनुकूल है) बनता है, संकल्प से कामना (इच्छा) पैदा होती है, फिर योजना बनती है और अंत में क्रिया होती है। इसके अतिरिक्त, 'त्यक्त्वा सर्वानशेषतः' में 'अशेषतः' पद पर बल देते हुए बतलाते हैं कि केवल क्रिया न करना पर्याप्त नहीं है; जब तक चित्त में वासना का बीज बैठा है, तब तक हवा-पानी और समय मिलते ही वह पुनर्नवा या बथुए के बीज की भाँति पुनः अंकुरित हो सकता है। इसलिए बीजों का भी विवेक द्वारा निष्कासन अनिवार्य है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि कामना का मूल संकल्प (मनसिज) ही है, और 'अशेषतः' का अर्थ वासना के बीजों को पूर्णतः नष्ट करना है, न कि केवल कुछ दिनों का बाह्य दिखावा।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि साधना में अति-उत्साह में आकर अचानक सब कुछ छोड़ देने से मन का पुराना संस्कार विद्रोही हो सकता है, इसलिए 'शनैः शनैः' (धीरे-धीरे योजनाबद्ध रूप से) आदतों को नियंत्रित करना चाहिए। 'उपरमेत्' का अर्थ राग-द्वेष से रहित होना है। इसके साथ ही, मन के ऊपर बुद्धि का पहरा ("सावधानी हटी, दुर्घटना घटी") और धैर्य की आवश्यकता है ताकि तुरंत फल न मिलने पर भी साधक का निश्चय न डिगे।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'शनैः शनैः' का अर्थ वर्ष में एक दिन साधना करना नहीं है, 'उपराम' राग-द्वेष की समाप्ति है न कि दूसरों का मज़ाक उड़ाना, और बुद्धि को जागृत रखना ध्यान-साधना की अनिवार्य शर्त है।
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