भ. गी. 6.26

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

अनुवाद

चञ्चल एवं अस्थिर मन जहाँ भी भटकता हो उसे वहाँ से हटाकर केवल स्वयं के वश में लाना चाहिए।

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प्रश्न 1, कुल 2

सांख्य दर्शन के अनुसार मन का निर्माण सात्विक अहंकार से होने के बाद भी (जिसका स्वाभाविक गुण शांति और ज्ञान है), इस संसार में व्यवहार करने के लिए मन में चंचलता (रजोगुण का गुण) क्यों आ जाती है?

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