भ. गी. 6.29

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥

अनुवाद

जिस योगी का मन योग के द्वारा परम सत्य में लीन हो चुका है और जो सर्वत्र परम सत्य का दर्शन करता है, वह समस्त प्राणियों में परमात्मा का तथा परमात्मा में समस्त प्राणियों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.२८ ("युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः...") की व्याख्या के अनुसार, श्लोक ६.२७ की तुलना में इसमें क्या अंतर बतलाया गया है, तथा पद 'विगतकल्मषः' के संदर्भ में पतंजलि योगसूत्र में वर्णित ९ अंतरायों (बाधाओं) की क्या महत्ता समझाई गई है?

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