भ. गी. 6.28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥

अनुवाद

इस प्रकार पूर्णतः पाप से मुक्त होकर और सदा अपने मन को संयमित रखते हुए योगी सहज ही ब्रह्म के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का शाश्वत आनन्द अनुभव करता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.२८ ("युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः...") की व्याख्या के अनुसार, श्लोक ६.२७ की तुलना में इसमें क्या अंतर बतलाया गया है, तथा पद 'विगतकल्मषः' के संदर्भ में पतंजलि योगसूत्र में वर्णित ९ अंतरायों (बाधाओं) की क्या महत्ता समझाई गई है?

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