भ. गी. 6.28
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
अनुवाद
इस प्रकार पूर्णतः पाप से मुक्त होकर और सदा अपने मन को संयमित रखते हुए योगी सहज ही ब्रह्म के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का शाश्वत आनन्द अनुभव करता है।
इस प्रकार पूर्णतः पाप से मुक्त होकर और सदा अपने मन को संयमित रखते हुए योगी सहज ही ब्रह्म के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का शाश्वत आनन्द अनुभव करता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि श्लोक ६.२७ में ध्यान-अभ्यास की प्राथमिक स्थिति का वर्णन था, जबकि ६.२८ में परिपक्व अवस्था का निरूपण है; इसीलिए यहाँ 'सदा' शब्द का प्रयोग किया गया है। इसके साथ ही, 'विगतकल्मषः' का अर्थ उन ९ अंतरायों (शारीरिक व मानसिक बाधाओं) से रहित होना बतलाया गया है जो चित्त में विक्षेप पैदा करती हैं। ये बाधाएँ (जैसे व्याधि, आलस्य, संशय, भ्रांति आदि) आध्यात्मिक मार्ग के साथ-साथ भौतिक जीवन में भी सफलता प्राप्त करने के लिए हटाना आवश्यक हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक में ध्यानयोग की साधना की परिपक्व अवस्था का निरूपण है, और ९ अंतराय चित्त-विक्षेप की आंतरिक बाधाएँ हैं, न कि बाह्य यात्राओं के विघ्न।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि अद्वैत दर्शन में आत्मा को निर्गुण ब्रह्म मानते हैं, किंतु भक्ति की दृष्टि में यहाँ 'आत्मा' का तात्पर्य परमात्मा/भगवान हैं। चूँकि निराकार ब्रह्म में दृष्टा और दृश्य एक हो जाते हैं, अतः भक्ति में भक्त और भगवान की पृथक सत्ता रहने से ही सच्चा 'समदर्शन' सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त, साधारण व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से स्वयं को केंद्र मानता है ('सब कुछ मेरे लिए है'), जबकि समदर्शी योगी राग-द्वेष से ऊपर उठकर भगवान को केंद्र मानता है ('सब कुछ भगवान की सेवा के लिए है')।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'समदर्शन' अहंकार और राग-द्वेष का त्याग कराता है, न कि व्यक्ति को स्वयं को संसार का केंद्र मानकर भोगी बनाता है।
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