भ. गी. 6.43
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
अनुवाद
हे कुरुवंशी! उन दोनों में से किसी भी जन्म में पूर्वजन्म में प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के साथ उसका पुनः संयोग हो जाता है, और तत्पश्चात वह सिद्धि प्राप्त करने हेतु नवीन उत्साह से प्रयत्न करता है।
हे कुरुवंशी! उन दोनों में से किसी भी जन्म में पूर्वजन्म में प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के साथ उसका पुनः संयोग हो जाता है, और तत्पश्चात वह सिद्धि प्राप्त करने हेतु नवीन उत्साह से प्रयत्न करता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि योगी का कुल धनाढ्य नहीं होता, और 'धीमताम्' का संबंध तत्व-ज्ञान से है न कि भौतिक व्यापार से।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.४१ के साधक (अल्पकालिक योगी) को पहले स्वर्ग जाकर भोग भोगने पड़ते हैं और फिर धनाढ्य कुल में जन्म मिलता है जहाँ भोगों में भटकने की संभावना रहती है। इसके विपरीत, श्लोक ६.४२ का साधक (दीर्घकालिक योगी) बिना समय व्यर्थ किए सीधे योगियों के कुल में जन्म लेता है, इसीलिए इसे 'दुर्लभतरम्' बतलाया गया है । वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यहाँ 'धीमताम्' का अर्थ ज्ञान-संपन्न (शास्त्रज्ञ) योगी हैं जो बच्चे को कर्मकांड या हठयोग में उलझाने के बजाय सही आध्यात्मिक दिशा-निर्देश दे सकें।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.४३ के अनुसार, साधक को पूर्वजन्म की देह में अर्जित अंतःकरण के आध्यात्मिक संस्कारों व ज्ञान का पुनः संयोग प्राप्त होता है, जिससे उसकी आध्यात्मिक मार्ग में स्वाभाविक रुचि जागृत होती है]। वक्ता समझाते हैं कि जन्म दो प्रकार के होते हैं—माता-पिता से प्राप्त भौतिक जन्म 'बिंदु कुल' है और सद्गुरु से दीक्षा/मंत्र प्राप्त करके भगवद्-परिवार में प्रवेश पाना 'नाद कुल' है, जो कि अत्यंत दुर्लभ व कल्याणकारी है ।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि यहाँ आध्यात्मिक संस्कारों के प्रस्फुटन की बात है न कि नश्वर सांसारिक संपत्ति की स्मृति की, और बिंदु कुल माता-पिता से मिलने वाले जन्म को कहते हैं ।
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