भ. गी. 6.43

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥

अनुवाद

हे कुरुवंशी! उन दोनों में से किसी भी जन्म में पूर्वजन्म में प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के साथ उसका पुनः संयोग हो जाता है, और तत्पश्चात वह सिद्धि प्राप्त करने हेतु नवीन उत्साह से प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.४२ ("अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्...") की व्याख्या के अनुसार, 'श्रीमतां गेहे' (धनाढ्य परिवार में जन्म - श्लोक ६.४१) की तुलना में ज्ञानी योगियों के कुल में जन्म लेने को भगवान श्रीकृष्ण ने 'दुर्लभतरम्' (अधिक दुर्लभ) क्यों कहा है, तथा यहाँ प्रयुक्त 'धीमताम्' पद का क्या विशेष तात्विक अर्थ बतलाया गया है?

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