निश्चय ही वह अपने पूर्वजन्म में किए गए अभ्यास के प्रभाव से बिना चाहे भी पुनः (योग की ओर) आकर्षित हो जाता है। जो साधक योग के विषय में केवल जिज्ञासु है, वह भी वेदों में वर्णित कर्मकाण्ड के मार्ग को पार कर लेता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.४४ ("पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः...") की व्याख्या के अनुसार, पूर्वजन्म के योग-अभ्यास के संस्कारों के संबंध में 'ह्रियते' (हरी धातु) और 'अवशोऽपि' पदों का क्या अर्थ समझाया गया है, तथा 'जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते' का क्या तात्विक तात्पर्य है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.४४ के अनुसार पूर्वजन्म के अभ्यास-संस्कार के प्रभाव से व्यक्ति अनायास ही ('अवशोऽपि') योग की ओर खिंच जाता है। वक्ता बताते हैं कि 'ह्रियते' हरी धातु से आता है जिसका अर्थ है पूर्व-अभ्यास का संस्कार चित्त को बलपूर्वक योग की ओर ले जाता है । साथ ही, जो योग का केवल 'जिज्ञासु' भी है, वह 'शब्दब्रह्म' (वेदों के सकाम कर्मकांडीय मार्ग) को पार कर जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि पूर्वजन्म के योग-संस्कार नष्ट नहीं होते और बेबस होकर साधक को योग की ओर खींचते हैं , तथा शब्दब्रह्म वेदों के सकाम कर्मकांडीय मार्ग को कहते हैं।
भगवद्गीता के श्लोक ६.४५ ("प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विषः...") की व्याख्या के अनुसार, 'प्रयत्नाद् यतमानस्तु' और 'अनेकजन्मसंसिद्धः' पदों द्वारा साधक के लिए क्या महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत और सावधानियाँ समझाई गई हैं?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.४५ में 'तु' पद द्वारा भगवान स्पष्ट करते हैं कि पूर्व संस्कारों के साथ-साथ वर्तमान का पुरुषार्थ ('प्रयत्नाद् यतमानः') अनिवार्य है। वक्ता समझाते हैं कि अंतःकरण के किल्विष (क्लिष्ट वृत्तियाँ/पाप/दोष) यत्नपूर्वक साधन करने से ही शुद्ध होते हैं, और अनेक जन्मों के संचित अभ्यास से परिपक्व होकर साधक परम गति को प्राप्त होता है ।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक में पुरुषार्थ ('प्रयत्नात्') पर विशेष बल दिया गया है, न कि केवल निष्क्रियता या भाग्य पर।