व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ६.५ ("उद्धरेदात्मनात्मानम्...") की क्या अद्वितीय विशेषता बतलाई गई है, तथा श्रीमद्भागवत के उद्धवामृत श्लोक ("नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभम्...") में मनुष्य शरीर, गुरु और भगवान के उपदेशों को किस सुंदर रूपक (दृष्टांत) द्वारा समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि पशु-पक्षियों के पास मन का ऐसा विकास नहीं होता जिससे वे अपना उद्धार कर सकें और भागवत के श्लोक में रथ का नहीं बल्कि नाव, नाविक और अनुकूल वायु का रूपक दिया गया है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, श्लोक ६.५ में सात बार 'आत्मा' शब्द आया है (जो किसी अन्य श्लोक में नहीं मिलता), जहाँ मन (आत्मा) द्वारा अंतरात्मा का उद्धार करने का निर्देश है। इसके साथ ही, भागवत के श्लोक के आधार पर वक्ता समझाते हैं कि दुर्लभ मनुष्य शरीर भवसागर पार करने हेतु सुकल्प 'नाव' है, गुरु उसके 'कर्णधार' (नाविक) हैं तथा भगवान द्वारा दिया गया ज्ञान (गीता) उस नाव को खेने वाली 'अनुकूल वायु' है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.६ ("बंधुरात्मात्मनस्तस्य...") की व्याख्या के अनुसार, मन किस स्थिति में 'मित्र' और किस स्थिति में 'शत्रु' बन जाता है, तथा श्लोक में प्रयुक्त 'शत्रुत्वे वर्तेत' पद द्वारा बाह्य शत्रुओं की तुलना में मन रूपी आंतरिक शत्रु का क्या विशेष खतरनाक स्वभाव उजागर किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.६ के अनुसार जिसने बुद्धि से मन को जीत लिया है, उसका मन मित्र है; अन्यथा वश में न होने पर मन शत्रु की तरह व्यवहार करता है। वक्ता बतलाते हैं कि बाहरी शत्रु अपने जीवन के अन्य कार्यों में भी व्यस्त रहते हैं और उनसे व्यक्ति सावधान हो सकता है, किंतु 'शत्रुत्वे वर्तेत' पद यह सिद्ध करता है कि अनियंत्रित मन २४ घंटे लगातार व्यक्ति के भीतर रहकर उसे फँसाने व दुख देने के कार्य में ही लगा रहता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अनियंत्रित मन मित्र नहीं बल्कि शत्रु की तरह व्यवहार करता है], और भागवत (भिक्षु गीत) तथा गीता के अनुसार दुख का मुख्य कारण बाहर का व्यक्ति नहीं बल्कि अपना मन ही है।