भ. गी. 6.5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

अनुवाद

मन के द्वारा आत्मा का उद्धार करना चाहिए और कभी उसका पतन नहीं होने देना चाहिए क्योंकि मन ही आत्मा का मित्र है एवं शत्रु भी है।

टिप्पणियाँ

* संस्कृत में आत्मन् शब्द के विभिन्न अर्थ हैं, जिनमें शरीर, मन, बुद्धि, प्राण, व्यक्तिगत आत्मा, ब्रह्म तथा प्रेम का सार और विषय सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ६.५ ("उद्धरेदात्मनात्मानम्...") की क्या अद्वितीय विशेषता बतलाई गई है, तथा श्रीमद्भागवत के उद्धवामृत श्लोक ("नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभम्...") में मनुष्य शरीर, गुरु और भगवान के उपदेशों को किस सुंदर रूपक (दृष्टांत) द्वारा समझाया गया है?

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