भ. गी. 6.4

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥

अनुवाद

जब कोई व्यक्ति इन्द्रिय-विषयों से एवं उनके भोग की ओर ले जाने वाले कर्मों से वास्तव में अनासक्त हो जाता है, तब ऐसे समस्त सङ्कल्पों के त्यागी को योगारूढ़ अवस्था प्राप्त कहा जाता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.३ ("आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते...") में 'आरुरुक्षु' (साधक) और 'योगारूढ़' (सिद्ध) के लिए क्या भिन्न-भिन्न साधन बतलाए गए हैं, तथा साधक के लिए कर्मयोग का आश्रय लेना क्यों अनिवार्य समझाया गया है?

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