भ. गी. 6.4
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
अनुवाद
जब कोई व्यक्ति इन्द्रिय-विषयों से एवं उनके भोग की ओर ले जाने वाले कर्मों से वास्तव में अनासक्त हो जाता है, तब ऐसे समस्त सङ्कल्पों के त्यागी को योगारूढ़ अवस्था प्राप्त कहा जाता है।
जब कोई व्यक्ति इन्द्रिय-विषयों से एवं उनके भोग की ओर ले जाने वाले कर्मों से वास्तव में अनासक्त हो जाता है, तब ऐसे समस्त सङ्कल्पों के त्यागी को योगारूढ़ अवस्था प्राप्त कहा जाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.३ के अनुसार योगारूढ़ होने के इच्छुक साधक (आरुरुक्षु) के लिए कर्म (निष्काम कर्मयोग) साधन है और योगारूढ़ के लिए 'शम' (समता/चित्त-शांति) साधन है। वक्ता बताते हैं कि मनुष्य के भीतर (विशेषकर रजोगुण के कारण) जो क्रिया करने का स्वाभाविक वेग है, उसे सीधे नहीं दबाया जा सकता; निष्काम भाव से कर्तव्य-कर्म करने पर ही वह क्रिया का वेग और फल की आसक्ति शांत होती है, जिससे साधक समता (शम) की स्थिति तक पहुँच पाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आरुरुक्षु के लिए कर्म-त्याग नहीं बल्कि निष्काम कर्मयोग बतलाया गया है, और योगारूढ़ के लिए शम (समता) साधन है न कि भारी शारीरिक कर्म।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि इंद्रियों को फोड़ना या भोजन का पूर्ण त्याग करना गीता का उपदेश नहीं है; भगवान नियंत्रित व भगवद्-अर्पित आहार (प्रसाद) तथा अनासक्ति का उपदेश देते हैं।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.४ के अनुसार जब व्यक्ति इंद्रिय-विषयों में अनासक्त होता है, कर्मों में अनासक्त होता है और सभी भौतिक संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह 'योगारूढ़' कहलाता है। वक्ता बतलाते हैं कि इंद्रिय-नियंत्रण का आरंभ जिह्वा/भोजन से होता है; जहाँ केवल शरीर-निर्वाह हेतु आवश्यकतानुसार भोजन लेना 'प्रकृति' है, अनियंत्रित व अखाद्य खाना 'विकृति' है, और भगवद्-अर्पित प्रसाद ग्रहण करना 'संस्कृति' है जिससे इंद्रियाँ स्वतः शुद्ध व नियंत्रित होती हैं।
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