भ. गी. 6.7
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
अनुवाद
जिस योगी ने अपने मन को जीत लिया है और जो पूर्ण रूप से शान्त है, उसका मन परमात्मा में ध्यानपूर्वक स्थिर रहता है – चाहे गर्मी हो या ठण्ड, सुख हो या दुःख, मान हो या अपमान।
जिस योगी ने अपने मन को जीत लिया है और जो पूर्ण रूप से शान्त है, उसका मन परमात्मा में ध्यानपूर्वक स्थिर रहता है – चाहे गर्मी हो या ठण्ड, सुख हो या दुःख, मान हो या अपमान।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बतलाते हैं कि सुख का भोग ही दुख से व्याकुल होने का मुख्य कारण/बीज है, क्योंकि सुख-दुख और मान-अपमान सिक्के के दो पहलुओं की भाँति अनिवार्य रूप से साथ आते हैं। इसलिए साधक को सुख और प्रशंसा में भी उद्वेग-रहित रहना चाहिए तथा निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पूर्व-कर्म का फल देकर चित्त-शुद्धि में सहायक मानकर धन्यवाद देना चाहिए।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि केवल दुख में मन को संभालने का प्रयास सफल नहीं होता यदि सुख का उपभोग करके दुख का बीज बोया गया हो, और बदला लेना मन में अशांति व कर्म-बंधन पैदा करता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि शास्त्र-ज्ञान 'ज्ञान' है और भगवद्-तत्त्व की प्रत्यक्ष अनुभूति 'विज्ञान' है, जिससे आत्मा सदा के लिए तृप्त हो जाती है। जिस प्रकार लोहार का ऐनहाड़ा (कूट) भारी चोट पड़ने पर भी स्थिर और निर्विकार रहता है, उसी प्रकार सिद्ध योगी 'कूटस्थ' होकर निर्विकार रहता है। तथा मिट्टी, पत्थर और सोने को समान दृष्टि से देखने का अर्थ उनके उपयोग को जानते हुए भी लाभ-हानि में सम व असंपृक्त रहना है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि यहाँ ज्ञान-विज्ञान का संबंध अध्यात्मज्ञान व आत्म-अनुभूति से है, न कि कूटनीति या सोने को मिट्टी में दबाने से।
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