जिनमें किञ्चित् भी विवेक नहीं है, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया ने हर लिया है, और जिन्होंने भौतिकवादी (आसुरी*) स्वभाव को अपना लिया है, ऐसे दुष्कर्मी मेरी शरण नहीं लेते हैं।
टिप्पणियाँ
* यहाँ आसुरी शब्द उन लोगों की भौतिकवादी प्रकृति को सूचित करता है, जिनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अन्य मनुष्यों, प्रकृति अथवा कर्म-सिद्धांत की कोई चिंता किए बिना भौतिक भोग करना है।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक "न मां दुष्कृतिनो मूढाः..." की व्याख्या के अनुसार, भगवान की शरण न लेने वाले चार प्रकार के दुष्कर्मियों (मूढ़, नराधम, माययापहृतज्ञान और आसुर भाव वाले) की क्या विशिष्ट तात्विक पहचान बतलाई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक में भगवान बतलाते हैं कि चार प्रकार के दुष्कर्मी उनकी शरण नहीं लेते। व्याख्यान में मूढ़ को काम-मोहाच्छादित व विवेकहीन, नराधम को दुर्लभ मानव देह पाकर भी पशु-तुल्य जीवन जीने वाला, माययापहृतज्ञान को शास्त्रज्ञ होकर भी माया से बुद्धि अपहृत होने के कारण भगवान को साधारण मानव या उपाधि मानने वाला, तथा आसुर भाव वाले को भगवद्-विरोधी व द्वेषी बतलाया गया है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि मूढ़, नराधम, माययापहृतज्ञान और आसुर भाव का संबंध आध्यात्मिक अविद्या, दुष्कर्म व भगवद्-विमुखता से है, न कि संन्यास या बाह्य निवास स्थान से।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक "चतुर्विधा भजन्ते मां..." की व्याख्या के अनुसार, भगवान का भजन करने वाले चार प्रकार के सुकृति भक्तों (आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी) तथा मीमांसा के 'पाठक्रम' और 'अर्थक्रम' के सिद्धांत के संबंध में क्या रहस्य समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि चारों भक्त केवल धन हेतु नहीं आते, और अर्थक्रम के अनुसार ज्ञानी निष्काम व सर्वश्रेष्ठ है।
विकल्प ख (सही): श्लोक में चार प्रकार के सुकृति भक्तों का वर्णन है। वक्ता बतलाते हैं कि आर्त दुख निवारण हेतु, अर्थार्थी धन-वैभव हेतु, जिज्ञासु तत्व-ज्ञान हेतु, और ज्ञानी अविद्या नाश हेतु भजन करते हैं। मीमांसा शास्त्र के नियम ('पाठक्रमात् अर्थक्रमो बलीयान्' - पाठ के क्रम से अर्थ का क्रम अधिक बलवान होता है) के अनुसार वास्तविक उन्नति का क्रम आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी है।