भ. गी. 7.14

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

अनुवाद

मेरी इस तीन गुणों से बनी दैवी बहिरंगा माया को पार करना वास्तव में अत्यन्त कठिन है परन्तु जो केवल मेरी शरण लेते हैं वे इस माया को पार कर जाते हैं।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक ('त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्...') की व्याख्या के अनुसार, 'जगत' शब्द का क्या वास्तविक अर्थ बतलाया गया है, तथा संसार में जीव के मोह/भ्रम को 'सोपाधिक भ्रम' क्यों कहा गया है?

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