भगवद्गीता के सातवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक ("तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते...") की व्याख्या के अनुसार, चार प्रकार के भक्तों में ज्ञानी भक्त को किन दो मुख्य विशेषणों के कारण विशेष/श्रेष्ठ बतलाया गया है, तथा 'अत्यर्थम्' पद के क्या सूक्ष्म तात्विक अर्थ समझाए गए हैं?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि ज्ञानी निष्काम होता है, और 'अत्यर्थम्' आवरण-रहित प्रगाढ़ प्रेम का सूचक है, न कि धन के व्यवधान का।
विकल्प ख (सही): श्लोक में भगवान ज्ञानी को अन्य तीन भक्तों की तुलना में विशेष बतलाते हैं क्योंकि वह 'नित्ययुक्त' (सदा जुड़ा रहने वाला) और 'एकभक्ति' (निष्काम व अनन्य भाव वाला) है। व्याख्यान के अनुसार 'अत्यर्थम्' के दो अर्थ हैं—पहला, यह प्रेम अनिर्वचनीय है जिसके लिए शब्द अपर्याप्त हैं, और दूसरा, 'अतिक्रांत-अर्थ' अर्थात् भगवान और भक्त के बीच कोई आवरण, कपट या व्यवधान नहीं रहता।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के अठारहवें श्लोक ("उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्...") की व्याख्या के अनुसार, कामनावान भक्तों को भी भगवान 'उदार' क्यों कहते हैं, तथा 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' और 'मामेवानुत्तमां गतिम्' का क्या तात्विक रहस्य समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भक्त भगवान को राज्य दान नहीं देते, और ज्ञानी नश्वर स्वर्ग के बजाय केवल भगवान को ही अपनी अनुत्तम गति मानता है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार भगवान मांगने आने वाले सकाम भक्तों को भी 'उदार' कहते हैं क्योंकि वे अन्य देवताओं के पास न जाकर केवल भगवान के पास आकर अपना समय देते हैं और भगवान की दातृ-उदारता के प्रकटीकरण का अवसर बनते हैं। ज्ञानी को भगवान अपनी 'आत्मा ही' (ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्) बतलाते हैं क्योंकि वह भगवान में तन्मय रहता है। तथा 'अनुत्तमां गतिम्' का अर्थ यह है कि वह भगवान से परे किसी अन्य वस्तु को श्रेष्ठ न मानकर केवल भगवान को ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानता है।