भ. गी. 7.18

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥

अनुवाद

ये सभी निःसन्देह उदार हैं परन्तु ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है । यह मेरा मत है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने मन को मुझमें स्थिर करके केवल मुझे ही परम लक्ष्य मानते हुए मेरी शरण ले चुका है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के सातवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक ("तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते...") की व्याख्या के अनुसार, चार प्रकार के भक्तों में ज्ञानी भक्त को किन दो मुख्य विशेषणों के कारण विशेष/श्रेष्ठ बतलाया गया है, तथा 'अत्यर्थम्' पद के क्या सूक्ष्म तात्विक अर्थ समझाए गए हैं?

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