भ. गी. 7.25
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
अनुवाद
दिव्य शक्ति (योगमाया) से आवृत मैं सभी के लिए प्रकट नहीं हूँ। इसलिए यह मोहित संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता है।
दिव्य शक्ति (योगमाया) से आवृत मैं सभी के लिए प्रकट नहीं हूँ। इसलिए यह मोहित संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अबुद्धि लोग भगवान को मूलतः अव्यक्त मानकर व्यक्त हुआ समझते हैं, और सूर्य साकार प्रकाश-पुंज है।
विकल्प ख (सही): श्लोक की व्याख्या के अनुसार बुद्धिहीन मनुष्य भगवान के नित्य दिव्य स्वरूप को न समझकर यह मानते हैं कि मूल तत्त्व केवल अव्यक्त ही है और वे केवल माया से शरीर धारण करते हैं। वक्ता सूर्य और सूर्य-प्रभा का उदाहरण देकर बतलाते हैं कि सूर्य स्वयं एक साकार मंडल है और उसकी प्रभा निराकार शक्ति है; उसी प्रकार भगवान साकार रूप में भी नित्य हैं और उनकी असीम प्रभा ही निराकार ब्रह्म है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार योगमाया भक्तों में वात्सल्य या सख्य भाव के आनंद को बढ़ाने के लिए भगवद्-ऐश्वर्य को ढँकती है और उन्हें भगवान के निकट लाती है, जबकि महामाया जीवों को भगवद्-विमुख बनाती है। वक्ता बतलाते हैं कि जैसे बादल सूर्य को नहीं ढँकता बल्कि देखने वाले की आँख/दृष्टि को ढँकता है, और जैसे रंगमंच पर नट का वेश देखकर लोग उसका असली परिचय नहीं जान पाते, वैसे ही माया से ढकी दृष्टि वाले मनुष्य भगवान को पहचान नहीं पाते।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि योगमाया भक्ति व प्रीति-संबंध बढ़ाती है, और बादल सूर्य को नष्ट नहीं करता बल्कि देखने वाले की दृष्टि को आच्छादित करता है।
Is Durga/Parvati- the consort of Lord Shiva the personified form of Mahamaya?