भगवद्गीता के सातवें अध्याय के तीसरे श्लोक की व्याख्या के अनुसार, मनुष्य शब्द की 'मनसा सीवति इति मनुष्यः' व्युत्पत्ति का क्या सूक्ष्म अर्थ समझाया गया है, तथा सहस्रों मनुष्यों में से किसी एक के ही अध्यात्म की ओर प्रवृत्त होने का क्या मुख्य मनोवैज्ञानिक व व्यावहारिक कारण बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति मानसिक संबंध बनाने की बतलाई गई है, और अध्यात्म से विमुखता का कारण इंद्रियों का बहिर्मुखी होना तथा नश्वर संस्कारों में फँसना है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बतलाते हैं कि 'मनसा सीवति इति मनुष्यः' के अनुसार मनुष्य अपने मन से हर जगह अनित्य व कल्पित संबंध सी लेता है ताकि अकेलापन दूर कर सुख पा सके। उपनिषद के नियम के अनुसार इंद्रियाँ बहिर्मुखी निर्मित हैं, जिससे मनुष्य बाह्य संबंधों में फँसा रहता है और सहस्रों में कोई एक विरला ही अंतर्मुखी होकर परमात्मा के लिए यत्न करता है।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के चौथे श्लोक की व्याख्या के अनुसार, भगवान की आठ प्रकार की अपरा प्रकृति (अष्टधा भिन्ना प्रकृतिः) तथा सांख्य दर्शन की तुलना में गीता दर्शन के 'मे भिन्ना प्रकृतिः' और 'अहंकार' का क्या तात्विक रहस्य समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आठ प्रकृति में पंचमहाभूत व अंतःकरण आते हैं, और प्रकृति भगवान की आश्रित शक्ति है, न कि उनसे स्वतंत्र सत्ता।
विकल्प ख (सही): श्लोक में भगवान अपनी आठ प्रकार की अपरा प्रकृति का वर्णन करते हैं। व्याख्यान के अनुसार सांख्य के विपरीत गीता दर्शन में केवल एक अद्वैत स्वतंत्र तत्व (भगवान) हैं और प्रकृति उनकी अपनी आश्रित शक्ति है। भौतिक अहंकार से तादात्म्य ही बंधन है, जबकि आत्मा का सच्चा स्वरूपगत अहम भगवान का दास होना है।