भ. गी. 7.5
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
अनुवाद
हे महाबाहो! यह मेरी अपरा प्रकृति है। परन्तु जानो कि इससे भिन्न मेरी परा प्रकृति है, जो जीव से बनी है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
हे महाबाहो! यह मेरी अपरा प्रकृति है। परन्तु जानो कि इससे भिन्न मेरी परा प्रकृति है, जो जीव से बनी है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार विशुद्ध चेतन तत्त्व आत्मा है, किंतु जब वह भौतिक अहंकार से जुड़कर शरीर को अपना मान लेती है, तब उसे 'जीव-भूत' या बद्ध जीव कहते हैं। इसके साथ ही, 'जगत' भगवान द्वारा निर्मित दृश्य प्रपंच है जो सत्य है, जबकि अज्ञान के कारण वस्तुओं में "यह मेरा है" का संबंध स्थापित करना 'संसार' है, जो कि कल्पित व असत्य है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आत्मा मूलतः नित्य व असंग है, और जगत भगवान की सत्य शक्ति है जबकि संसार अज्ञानजनित भ्रम है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान स्वयं स्वायत्त व सर्वकारण हैं, और अदृश्य सूत (परमात्मा) ही संपूर्ण मणियों (प्रपंच) का वास्तविक आधार है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार भगवान ही इस जगत् की उत्पत्ति (प्रभव) और प्रलय के मूल कारण हैं। वे कुम्हार की भाँति केवल बाह्य शिल्पी नहीं हैं, बल्कि मकड़ी की तरह निमित्त और उपादान दोनों कारण स्वयं हैं। 'सूत्रे मणिगणा इव' का अभिप्राय यह है कि जैसे माला में मणियाँ दिखाई देती हैं पर उन्हें सँभाले रखने वाला सूत अदृश्य रहता है, वैसे ही दृश्य प्रपंच के पीछे अदृश्य भगवान ही सबका आधार हैं।
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