अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
अनुवाद
अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से इन सम्बन्धियों को यहाँ उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है । मेरा शरीर काँप रहा है, और रोङ्गटे खड़े हो गए हैं।
व्याख्यान के अनुसार, कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अपने सभी स्वजनों को उपस्थित देखकर अर्जुन के भीतर भयंकर विषाद और शारीरिक व्याकुलता उत्पन्न होने का वास्तविक मूल कारण क्या है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन कोई कायर योद्धा नहीं था और न ही वह युद्ध में हार-जीत या स्वयं की मृत्यु के भय से डर रहा था। उसका विषाद केवल अपने स्वजनों के प्रति उपजे ममत्व और उनके विनाश की सम्भावना से था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन के विषाद का मूल कारण क्षत्रिय के रूप में पराजय का भय नहीं, बल्कि मोह जनित 'ममत्व' है। जब उसने अपने सभी सम्बंधियों को देखा, तो उसे यह भय हुआ कि युद्ध में उसके सभी सम्बंधी नष्ट हो जाएँगे, जिससे जीवन का सारा रस और सम्बंध समाप्त हो जाएँगे।
कुरुक्षेत्र में युद्ध न करने के लिए अर्जुन द्वारा दिए गए तर्कों और उसकी 'कृपा' (अहिंसा की भावना) के विषय में व्याख्यान में क्या सूक्ष्म दार्शनिक विश्लेषण किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन की यह भावना निष्काम नहीं थी, बल्कि मोह पर आधारित थी। इसके साथ ही, अर्जुन स्वभाव से एक क्षत्रिय योद्धा था; इसलिए उसका यह विचार उसकी मूल प्रकृति के विपरीत एक क्षणिक मानसिक निर्बलता मात्र था, न कि वास्तविक संन्यास।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन की अहिंसा वास्तविक आध्यात्मिक अहिंसा नहीं है। उसने विशेष रूप से 'स्वजन' (अपने लोग) शब्द का प्रयोग किया, जिसका तात्पर्य है कि उसकी दया केवल अपनों तक सीमित थी। यदि सामने उसके अपने सम्बंधी न होकर कोई अन्य लोग होते, तो वह उनसे निसंकोच युद्ध करता।