पुरुषोत्तमयोग
बारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने प्रस्थापित किया कि निर्विशेष, निर्गुण व अव्यक्त विचार पर आधारित ब्रह्म के उपासकों के लिए अपने लक्ष्य को प्राप्त करना अधिक कठिन है । देह में अत्यासक्ति होने के कारण हमारे सभी व्यावहारिक अनुभव उन वस्तुओं से सम्बन्धित हैं जिनका आकार है । इस प्रकार रूपहीन या अव्यक्त किसी भी वस्तु की कल्पना करना दुर्गम है । अतः मन को भगवान के साकार रूप पर केन्द्रित करना आसान है । अध्याय १३ व १४ में, देह आसक्ति की इस कठिनाई को कैसे दूर किया जाए, तथा परम तत्त्व का भी वर्णन किया गया है ।
जीव ईश्वर की तटस्थ शक्ति का अंश होने के कारण सनातन हैं, परन्तु देह में आत्माभिमान, तथा जगत के प्रति आसक्ति होने के कारण, वे संसार में बद्ध हैं । जब तक वे भगवान की महिमा से अनभिज्ञ हैं, तब तक वे इन प्राकृतिक गुणों के बन्धन से मुक्त नहीं हो सकते हैं । अतः पन्द्रहवें अध्याय में, श्रीकृष्ण अपनी महिमा व रहस्य का वर्णन करते हैं, जिससे व्यक्ति अनन्या भक्ति की साधना करने में समर्थ बनता है । इस अध्याय में बीस श्लोक हैं, जो सभी भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा बोले गए हैं ।
चूंकि जीव ईश्वर की तटस्थ शक्ति का अंश हैं, उनकी स्वाभाविक अवस्था केवल श्री भगवान की सेवा और उन्हें प्रेम करना है । तथापि माया के प्रभाव से अज्ञानवश जीव (आत्मा) देह, इन्द्रियों, मन और बुद्धि के साथ अपनापन मान लेते हैं, जो कि मात्र प्रकृति के विकार ही हैं । उन्हें "मैं" या "मेरा" या "मेरे लिए" के रूप में मान लेते हैं । यह अनन्य भक्ति की साधना में मुख्य बाधा है ।
ब्रह्माण्ड को एक अश्वत्थ वृक्ष के रूप में वर्णित करने के पश्चात् भगवान अर्जुन को माया के प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए वैराग्य रूपी कुल्हाड़ी से इस वृक्ष को काटने के लिए कहते हैं और परम पुरुष और उनके परमधाम की शरण लेने के लिए प्रेरित करते हैं (१-४) । वे सर्वप्रथम इस परम-धाम (५-६) का वर्णन करते हैं, तथा फिर जीव एक देह से दूसरे देह में कैसे स्थानान्तरण (७-८) करता है उसका वर्णन करते हैं । विचक्षण जन इस स्थानान्तरण को समझ सकते हैं परन्तु मूढ़ व्यक्ति नहीं समझ सकते (१०-११) । श्रीकृष्ण अपनी महिमा बताते हुए कहते हैं कि वे प्रत्येक वस्तु के स्रोत, कारण व आश्रय (१२-१५) हैं । वे फिर परमात्मा, जीव और भौतिक प्रकृति (१६-१८) के मध्य के अन्तर को बताते हैं । जो इस प्रकार भगवान को जो जानता है, वह उनके प्रति समर्पित हो जाता है: "जो मोहरहित होकर मुझे इस प्रकार परम पुरुष के रूप में जानता है वह सर्व वस्तुओं का ज्ञाता (सर्वज्ञ) है, तथा अनन्या भक्ति से मेरी आराधना करता है" (१९) । श्रीकृष्ण ने इस अत्यन्त गोपनीय ज्ञान का उद्घाटन स्वयं के प्रति भक्ति को प्रेरित करने के लिए किया (२०) ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1श्री भगवान ने कहा: [वेदों में] कहा जाता है कि एक अविनाशी अश्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं और जिसके पत्ते वैदिक छन्द हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है।
- श्लोक 2प्रकृति के गुणों से पोषित और इन्द्रिय-विषयरूपी कोमल पत्तों से युक्त उसकी शाखाएँ ऊपर और नीचे फैली हुई हैं। कर्म के निरन्तर बन्धन का कारण उसकी [गौण] जड़ें मनुष्य-लोक में भी नीचे की ओर फैली हुई हैं।
- श्लोक 3-4इस भौतिक जगत् में इस वृक्ष का पूर्ववर्णित स्वरूप निर्धारित नहीं किया जा सकता; इसका न अन्त है, न आदि और न ही कोई आधार। वैराग्य के शक्तिशाली शस्त्र से इस गहरी जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को काटकर उस धाम की तत्परतापूर्वक खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचने के बाद लोग फिर लौटकर नहीं आते, [यह कहते हुए,] “मैं केवल उसी आदिपुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह प्राचीन सृष्टि प्रवृत्त हुई है।”
- श्लोक 5जो [बुद्धिमान लोग] अभिमान और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने भौतिक आसक्ति के दोषों पर विजय पा ली है, जो सदा आध्यात्मिक साधना में लगे रहते हैं, जो भौतिक कामनाओं से पूर्णतः मुक्त हैं, जो सुख और दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं और जो मोह से परे हैं, वे उस शाश्वत धाम को प्राप्त होते हैं।
- श्लोक 6न सूर्य, न चन्द्रमा और न ही अग्नि उस धाम को प्रकाशित करते हैं। वह मेरा परम धाम है, जिसे प्राप्त करके लोग फिर नहीं लौटते।
- श्लोक 7सनातन जीव केवल मेरा ही अंश है। इस भौतिक जगत् में वह मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ उलझा हुआ है, जो प्रकृति में स्थित हैं।
- श्लोक 8[जब] शरीर का स्वामी [जीव] पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करता है, तब वह इन छह इन्द्रियों को अपने साथ ले जाता है, जैसे वायु सुगन्धित स्रोत से गन्धों को अपने साथ ले जाता है।
- श्लोक 9श्रवण, दृष्टि, स्पर्श, स्वाद और गन्ध की इन्द्रियों तथा मन पर अधिष्ठित होकर वह [जीव] इन्द्रिय-विषयों का उपभोग करता है।
- श्लोक 10इन्द्रियों की गतिविधियों में उलझे हुए मूढ़बुद्धि लोग [आत्मा को] न तो शरीर से निकलते समय, न उसमें स्थित रहते समय और न ही [इन्द्रियों के द्वारा इन्द्रिय-विषयों का] अनुभव करते समय प्रत्यक्ष कर पाते हैं, [किन्तु] ज्ञान-चक्षु से सम्पन्न लोग [उसका] अनुभव करते हैं।
- श्लोक 11प्रयत्नशील योगी अपने हृदय में स्थित इसका [आत्मा का] प्रत्यक्ष साक्षात्कार करते हैं, [जबकि] जिनका अन्तःकरण अशुद्ध है और जो अविवेकी हैं, वे प्रयत्न करने पर भी इसे नहीं देख पाते।
- श्लोक 12सूर्य, चन्द्रमा, और अग्नि का जो प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उस प्रकाश को मेरा जानो।
- श्लोक 13अपनी शक्ति से पृथ्वी में प्रवेश करके मैं समस्त जीवों को धारण करता हूँ और अमृत से परिपूर्ण चन्द्रमा बनकर समस्त पौधों और औषधीय जड़ी-बूटियों का पोषण करता हूँ।
- श्लोक 14समस्त जीवों के शरीर में पाचन-अग्नि (वैश्वानर) के रूप में प्रवेश करके और [ऊपर तथा नीचे प्रवाहित होने वाली] प्राण और अपान वायुओं से संयुक्त होकर मैं चार प्रकार के भोजन को पचाता हूँ।
- श्लोक 15मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है। समस्त वेदों के द्वारा केवल मैं ही ज्ञेय हूँ। वास्तव में मैं ही वेदान्त का रचयिता हूँ और मैं ही वेदों का ज्ञाता हूँ।
- श्लोक 16इस जगत् में दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर [अर्थात् शरीर] और अक्षर [अर्थात् आत्मा]। ये सभी शरीर क्षर हैं, जबकि अविकारी [आत्मा] को अक्षर कहते हैं।
- श्लोक 17किन्तु [इन दोनों से] भिन्न है परम पुरुष, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो अव्यय नियन्ता है, [और] जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन करता है।
- श्लोक 18क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी श्रेष्ठ हूँ, इसलिए इस लोक में और वेदों में मैं परम पुरुष [पुरुषोत्तम] के रूप में विख्यात हूँ।
- श्लोक 19हे भरतवंशी! जो मोह से रहित होकर मुझे इस प्रकार परम पुरुष के रूप में जानता है, वह सबका ज्ञाता है और संपूर्ण भक्ति से मेरी उपासना करता है।
- श्लोक 20हे भरतवंशी! हे अनघ! इस प्रकार मैंने इस परम गोपनीय ज्ञान का निरूपण किया है। इसका बोध करके मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है और उसके समस्त कर्तव्य संपूर्ण हो जाते हैं।
प्रश्न