गुण-त्रय-विभागयोग

अध्याय १३ के अन्त में, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो व्यक्ति ज्ञानरूपी नेत्र से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के मध्य के अन्तर को देखता है, वह परम तत्त्व को प्राप्त करता है । यह स्वाभाविक रूप से निम्न लिखित प्रश्नों को जन्म देता है: वास्तव में वह ज्ञान क्या है, उसका मूल्य या महिमा क्या है, और उसे कैसे प्राप्त किया जाता है ? श्रीकृष्ण इन प्रश्नों के उत्तर चौदहवें अध्याय में देते हैं । इस अध्याय में सत्ताईस श्लोक हैं, जिनमें से एक श्लोक अर्जुन के द्वारा बोला गया है और शेष श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गये हैं ।

प्रकृति और प्रकृति का विकार बन्धन का कारण बनते हैं । फलतः श्रीकृष्ण ने प्रकृति एवं उसके विकारों का किञ्चित् वर्णन पूर्व अध्यायों में किया था जिसे समझकर साधक "अहंता-ममता" के भाव को त्यागने में समर्थ होता है। इस अध्याय में, वे उन प्राकृतिक गुणों का विश्लेषण एवं विभाजन समझाते हैं जो प्रकृति के सभी विकारों में व्याप्त हैं ।

आरम्भ के दो श्लोको में श्रीकृष्ण ज्ञान की सराहना करते हैं । वे कहते हैं कि जिन लोगों ने इस ज्ञान का आश्रय लिया है, उन्होंने उनके समान स्वभाव प्राप्त कर लिया है (२) । तब श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके तीन गुणों का वर्णन व्याख्या सहित श्लोक २० तक करते हैं । वे बताते हैं कि प्रकृति गर्भ के समान है जिसमें भगवान जीवमात्र का बीजरूप में स्थापन करते हैं, जैसे कि पुरुष स्त्री में प्रजनन बीज रोपन करता है (३-४) । तत्पश्चात् विभिन्न जीव अपने कर्मानुसार जन्म लेते हैं । प्रकृति में तीन गुण होते हैं, जो सत्त्व, रजस् और तमस् हैं । सत्त्व शुद्ध और प्रकाशमान है, तथापि यह व्यक्ति को सुख और ज्ञान से बांधता है । रजस् लालसा - आवेग है जो इच्छा और आसक्ति को जन्म देता है तथा यह कर्म वासना से बांधता है । तमस् अज्ञान से आता है और जीव को भ्रमित करता है, अतः तामसिक व्यक्ति प्रमादी, आलसी और निद्रालु होता है ।

श्रीकृष्ण क्रमशः सत्त्व, रजस् और तमस् के प्रभाव में किए गए कर्मों के परिणाम के साथ-साथ उनके प्रभाव में मरणासन्न व्यक्ति की क्या गति होती है उसका भी वर्णन करते हैं । यहाँ तीन प्राकृतिक गुणों की मूल विशेषताएँ दर्शाई हैं (५-१८) । जो लोग यह अनुभव करते हैं कि केवल प्राकृतिक गुण ही कार्य कर रहे हैं और वे गुणों से परे हैं एवं उनसे भिन्न हैं, वे ईश्वर के भाव को प्राप्त करते हैं (१९) । गुणातीत (जिसने तीन गुण को पार कर लिया है) व्यक्ति जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के कष्टों से मुक्त हो जाता है (२०) ।

यह सुनकर अर्जुन प्रश्न पूछता है: "गुणातीत व्यक्ति किन-किन विशेषताओं से जाना जाता है" (२१)? उसका आचरण – व्यवहार समाज़ में कैसा है और वह तीन गुणों को कैसे पार करता है ? अध्याय के अन्त के छह श्लोकों में श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं । गुणातीत व्यक्ति की विशेषताओं को दर्शाने के बाद वे बताते हैं कि अनन्या भक्ति से भक्तगण ऐसी स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं (२२-२५) । ऐसे भक्त ब्रह्म साक्षात्कार के योग्य हो जाते हैं (२६) । इस अध्याय के अन्तिम श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि "वे ही ब्रह्म का आधार हैं ।" फलतः उनका तात्पर्य यह है कि उनके भक्त स्वाभाविक रूप से ब्रह्म प्राप्ति करते हैं और गुणातीत होते हैं ।

सभी श्लोक

  1. श्लोक 1श्री भगवान ने कहा: मैं समस्त ज्ञानों में श्रेष्ठ और परम ज्ञान का पुनः वर्णन करूँगा, जिसका बोध करके सभी मुनियों ने इस संसार से मुक्ति की परम सिद्धि प्राप्त की।
  2. श्लोक 2इस ज्ञान का आश्रय लेकर जिन्होंने मेरे स्वभाव और गुणों के साथ समानता प्राप्त की है, वे सृष्टि के समय भी पुनः जन्म नहीं लेते और न ही प्रलय के समय व्यथित होते हैं।
  3. श्लोक 3हे भरतवंशी! अपरिमेय भौतिक प्रकृति (ब्रह्म) मेरी योनि है, जिसमें मैं [समस्त चेतन जीवों के] बीज को स्थापित करता हूँ, जिससे समस्त प्राणियों का जन्म होता है।
  4. श्लोक 4हे कुन्तीपुत्र! समस्त जीव-जातियों में जो भी रूप उत्पन्न होते हैं, अपरिमेय भौतिक प्रकृति उनका स्रोत है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।
  5. श्लोक 5हे महाबाहो! भौतिक प्रकृति से उत्पन्न गुण, अर्थात् सत्त्व, रजस् और तमस्, अविनाशी देहधारी जीव को शरीर से बाँधते हैं।
  6. श्लोक 6इनमें सत्त्व, निर्मल होने के कारण, प्रकाशक और दुःख से रहित है। किन्तु हे अनघ! वह सुख और ज्ञान की आसक्ति के द्वारा बाँधता है।
  7. श्लोक 7रजस् को रागात्मक तथा तृष्णा और आसक्ति का स्रोत जानो। हे कुन्तीपुत्र! वह कर्म की आसक्ति के द्वारा देहधारी जीव को बाँधता है।
  8. श्लोक 8किन्तु तमस् को अज्ञान का स्रोत और समस्त देहधारी जीवों को मोहित करने वाला जानो। हे भरतवंशी! वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा दृढ़ता से बाँधता है।
  9. श्लोक 9हे भरतवंशी! सत्त्व सुख से बाँधता है, रजस् कर्म से, जबकि तमस्, ज्ञान को ढककर, प्रमाद से ही बाँधता है।
  10. श्लोक 10हे भरतवंशी! रजस् और तमस् को दबाकर सत्त्व प्रधान हो जाता है, सत्त्व और तमस् को दबाकर रजस् प्रधान हो जाता है, और सत्त्व तथा रजस् को दबाकर तमस् प्रधान हो जाता है।
  11. श्लोक 11जब शरीर के द्वाररूप समस्त ज्ञानेंद्रियों में वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को प्रकाशित करने वाला ज्ञान उत्पन्न होता है, तब जानना चाहिए कि सत्त्व ही प्रधान है।
  12. श्लोक 12हे भरतश्रेष्ठ! जब रजस् प्रधान होता है, तब ये उत्पन्न होते हैं: लोभ, प्रवृत्ति, [भौतिक उद्देश्य से] कर्मों का आरम्भ और [इन्द्रिय-विषयों की] अनियन्त्रित इच्छा।
  13. श्लोक 13हे कुरुवंशी! जब तमस् प्रधान होता है, तब विवेक का अभाव, कर्तव्य के प्रति उदासीनता, प्रमाद और मोह प्रकट होते हैं।
  14. श्लोक 14यदि सत्त्व की प्रधानता के समय देहधारी जीव की मृत्यु होती है, तो वह उन शुद्ध लोकों को प्राप्त करता है जहाँ परम ज्ञानी जाते हैं।
  15. श्लोक 15यदि कोई रजस् के प्रभाव में मृत्यु को प्राप्त होता है, तो वह कर्म में आसक्त लोगों के बीच जन्म लेता है। इसी प्रकार, तमस् की प्रधानता में मृत्यु को प्राप्त होने वाला, अज्ञानी जीव-जातियों में जन्म लेता है।
  16. श्लोक 16पुण्य कर्म का फल सात्त्विक और शुद्ध कहा जाता है। किन्तु राजसिक कर्म का फल दुःख है और तामसिक कर्म का फल अज्ञान है।
  17. श्लोक 17ज्ञान सत्त्व से उत्पन्न होता है, जबकि रजस् से केवल लोभ उत्पन्न होता है। इसी प्रकार तमस् से असावधानी, मोह और अज्ञान ही उत्पन्न होते हैं।
  18. श्लोक 18सत्त्व में स्थित लोग ऊपर [उच्च लोकों में] जाते हैं, रजस्-स्वभाव वाले मध्य [पृथ्वी-लोक] में रहते हैं, और तमस्-स्वभाव वाले, जो निम्नतम गुणों से उत्पन्न निकृष्ट आचरण और स्वभाव में फँसे हुए हैं, नीचे [निम्न लोकों में] चले जाते हैं।
  19. श्लोक 19जब विवेकी व्यक्ति भौतिक प्रकृति के गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य कर्ता को नहीं देखता और [स्वयं को] गुणों से परे जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त करता है।
  20. श्लोक 20शरीर को उत्पन्न करने वाले प्रकृति के इन तीन गुणों को पार करके देहधारी जीव जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सभी प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाता है तथा मुक्ति को प्राप्त करता है।
  21. श्लोक 21अर्जुन ने पूछा: हे प्रभो! किन लक्षणों से किसी को प्रकृति के इन तीन गुणों से परे जानना चाहिए? उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीन गुणों को कैसे पार करता है?
  22. श्लोक 22-25श्री भगवान ने कहा: हे पाण्डुपुत्र! जो व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश, प्रवृत्ति और यहाँ तक कि मोह के उपस्थित होने पर भी उनसे द्वेष नहीं करता और उनके समाप्त हो जाने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता; जो [साक्षी के समान] उदासीन-सा रहता है, प्रकृति के गुणों से विचलित नहीं होता और ‘प्रकृति के गुण ही कार्य कर रहे हैं’ इस बोध में दृढ़ रहकर अचल रहता है; जो सुख और दुःख में समान है, आत्मा में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानता है, अनुकूल और प्रतिकूल वस्तुओं तथा परिस्थितियों को समान समझता है, और धीर है, निन्दा और स्तुति के प्रति तुल्य है; जो मान और अपमान में तुल्य है, मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करता है और जिसने सभी उपक्रमों का त्याग कर दिया है, ऐसा व्यक्ति गुणातीत कहलाता है।
  23. श्लोक 26जो व्यक्ति अव्यभिचारी भक्ति से केवल मेरी सेवा करता है, वह प्रकृति के इन गुणों को पूर्णतः पार कर जाता है और ब्रह्मानुभव के योग्य बन जाता है।
  24. श्लोक 27निश्चय ही मैं ब्रह्म का, अविनाशी अमरत्व का, शाश्वत धर्म [भक्ति] का और परम आनन्द [प्रेम] का आश्रय हूँ।